बुनबा हलवाहा

बुनबा हलवाहा
पचास के दशक में हमारे गाँव में खेती किसानी और पशु पालन ही सभी का मुख्य पेशा था । पहाड़ी के पास बसा हमारा गाँव सब तरह से संपन्न था। खेती बाड़ी संभालने और पशुओं की देखभाल के लिए लगभग सभी घरों में उनके हलवाहे होते थे। बुनबा माझी भी हमारे घर का पुस्तैनी हलवाहा था। जब भी काम पर बुलाया जाता वह सुबह सवेरे ही आ जाता था । बैलों को चारा डालता, हल तैयार करता और मुँह अंधेरे हलबैल लेकर खेतों पर जुताई करने चला जाता था । आठ बजे उसके लिये रोटी सब्जी और पानी लेकर पिता जी खेतों पर जाते थे। तब तक वह आधा बीघा खेत जोत चुका होता था। फिर हल खड़ा कर वह रोटी खाता थोड़ी देर आराम करता और फिर काम पर लग जाता था ।
दोपहर हल बैल लेकर घर लौट आता था। बैलों को नाद पर बाँधकर चारा डालता। खुद हाथ पैर धोकर लोटे में पानी लेकर बरामदे में आकर बैठ जाता । माँ उसे कभी रोटी सब्जी अचार और प्याज खाने को देती तो कभी जौ बूट मक्का का सत्तू, जिसे वह बहुत ही प्यार से खाता था । जाने वक़्त डेढ़ सेर कोई भी अनाज उसे दी जाती थी। खेत बोने , गोराई करने के साथ साथ पशुओं के लिये चारा पानी लाने का सभी काम वह मन लगाकर करता था । जब कभी उसे हमारे घर काम नहीं मिलता तब वह किसी दूसरे के घर काम करने जाता था या जंगल जाकर जलावन की लकड़ी लाता और हमारे गाँव में बेचकर अपना गुजर बसर करता था । फसल की रखवाली के लिये उसे अलग से दस कट्ठे के टुकड़ा से तीसरा हिस्सा उसे दिया जाता था । इस तरह उसे अपने खाने के लिये कभी भी परेशानी नहीं होती थी । वह बहुत ही वफादार और इमानदार हलवाहा था। पिता जी उसे बहुत मानते थे और फसल घर आने पर उसे अलग से अनाज दिया जाता था जो उसकी मजदूरी से अलग होती थी । वह जबतक जिन्दा रहा हमारे परिवार का हिस्सा बनकर रहा।
आज वर्षों बाद भी उसकी सेवा और कर्मठता मुझे याद है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

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