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शहीद फौजी

हर शहीद हर फौजी की है यही कहानी,
सीने में है दर्द और आँखों में पानी ।
जो हुए शहीद सरहद पर उनकी,
लिपट तिरंगे में जब उनकी अर्थी है आती ।
धूम धाम गाजे बाजे के साथ सभी,
स्वागत करते शीश नवाते वहाँ सभी ।
उनकी पत्नी बच्चों को आशीष वो देते ।
चन्द महीनों बाद सभी फिर भूल भी जाते ।
फौजी की बेवा अब उनको नहीं सुहाते ।
लूट खसोट कर उनकी पूँजी,
घरवाले भी नहीं उन्हें घर रहने देते।
हाय री दुनियाँ हाय री माया,
फौजी का परिवार बेचारी दर दर भटके।
फौजी का परिवार बेचारी दर दर भटके।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

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मत भूलो वीर शहीदों को

याद रहे तुम सबको ये दिन ,

चौदह फरवरी का वो दिन ।

राजगुरु शुकदेव भगत सिंह,

चूम लिये थे जिसने उस दिन,

फांसी वाली फंदों को।

मत भूलो इनकी कुर्बानी,

मत भूलो इन वीर शहीदों को ।

वेलेंटाइन पर्व मनाने वाले,

शरम करो और डूब मरो।

आज जो इस खुली हवा में,

आजादी से घूम रहे हो ।

है इन्हीं सपूतों की बलिदानी,

जो तुम खुलकर जी रहे हो।

फूल चढ़ा इन्हें नमन करो तुम,

मत भूलो इन बलिदानी को ।

याद करो इन वीरों को।

तुम याद करो इन वीरों को ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

समय का फेर

बिन चप्पल बिन जूती के, चलते थे तब खेतों में ।

धूप घाम में खटते थे, सुबह से दिन भर खेतों में ।

हल बैलों से खेती होती, कभी नहीं तब थकते थे।

पशुशाला में गैया पलती, बैलों की तब जोड़ी थी।

सुबह शाम चारा देना भी, मिलकर हम सब करते थे ।

दूध दही माखन रोटी संग, बड़े मजे से खाते थे ।

घर बारी में पेड़ लगे थे, अमरूद और पपीते के।

खूब मजे से फल खाते थे, दूध सुबह को पीते थे ।

पढ़ने को स्कूल जाते थे, बड़े मजे में रहते थे ।

बड़े हो गये कालेज पहुंचे, फिर सरकारी काम मिला ।

गाँव हमरा दूर हो गया, बन परदेशी घर भूल गया ।

बच्चे और परिवार सहित, दूर शहर में बना रहा।

बाप दादो की वही अमानत, मुझको आज है बुला रहा।

नहीं रही अब बूढ़ी रग में, ताकत खेतों पर जाने की ।

बच्चे अब कैसे पहचाने, माटी अब उन पुरखों की ।

जहाँ नहीं वो खेला खाया, नहीं बिताया बचपन वो।

स्कूल कालेज शहर शहर में, नौकर भी परदेश में वो।

आज समय ऐसा अब आया, पैर नहीं बिन जूती के ।

संगमरमर पर चलना मुश्किल, बिना पैरों में जूती के।

गाँव और शहर में रहना, समय के साथ की घटना है ।

बदला है ये देश जो अपना, पाँच दशक में इतना है।

खेतों पर अब खटने वाले, भाग रहे हैं खेतों से।

छोटी छोटी खेती रह गयी, पेट नहीं अब भरने से।

आबादी बढ गयी चार गुनी, अन्न कहाँ से आयेगा ।

खेत छोड़ किसान यहाँ के, शहरी चाकर बनते हैं ।

बिन कृषक अन्न कौन उगाये, कैसे उनको यह समझाये।

अन्ना दाता हैं कृषक हमारे, शासन ही अब युगत बिठाये।

उनको उचित सम्मान दिलाकर, खेतों पर उनको लौटाये।

खेतों पर उनको लौटाये।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

सैनिकों की व्यथा

फोटो पर है फूल चढाना ,आज सभी को भाता है।
जीते जी सैनिक सम्मान,नहीं किसी को आता है।
रेल सफ़र में धक्के खाकर, फौजी जब घर आता है।
टीटी भी फौजी वर्दी पर, रहम कहाँ वो खाता है।
बिना लिये नोटों की गड्डी, जगह न उनको देता है।
घर वाले भी नोच नोच कर , सदा उसे को खाता है।
गर विधवा हुई उसकी घरवाली,घोल घोल सब पीता है।
मरने वाला देश के खातिर, जान गवाता सरहद पर।
घरवाली मरती बेचारी, रोज रोज अपने घर पर।
बच्चे हुए अनाथ जब उनका, घरवाले क्यों कर सोचे।
सरकारी अनुदान का मालिक,घर वाले ही बन बैठे।
बेचारी विधवा नारी भी, कैसे अपना हक मांगे।
असहाय निर्बल वह नारी, लुटती जिसकी लाज घरों में।
घरवाले ही भक्षक बन गये, किसे कहे वो लाज बचाने।
फौजी सदा ही छला गया है, घर और बाहर अपनों से।
ड्यूटी पर अफ़सर छलते हैं, और समाज में घरवाले।
राजनीति के खेल में फौजी,फँसकर रह गये बेचारे।
जीते जी हर रोज वो मरते, देश के खातिर बोडर पे।
कहाँ उसे है चैन रे भैया,जीकर भी जो घर आये।
इस समाज में उसका जीना,काफ़ी दूभर है भैया।
तेल और पानी का मिलना,नहीं आज तक देखा भैया।
तेल और पानी का मिलना,नहीं आज तक देखा भैया।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।