Monthly Archives: June 2020

घरों से बाहर निकलना दूभर हो जायेगी

शायद ये वर्षों लग जाये पुरानी दौड़ लौटने में ।
या फिर कभी लौट ही न पाये जमाने में ।
कितनों के जन्मदिन निकल गये हैं ।
कितनों की शादी की सालगिरह भी।
इकठ्ठे होकर खाना पीना तो छोडें।
चाय पीना भी जमाना हो गया साथ में ।
रोते हैं चाय दुकान वाले पकौड़ी चाट वाले ।
होटल रेस्तरां भी बीरान है सारे दुकान वाले ।
मजदूर तो मजदूर रो रहे हैं सारे ईमान वाले ।
हालात यही रही तो मिट जायेंगे ये दुकान वाले ।
लूट खसोट चोरी बेईमानी बढ़ जायेगी ।
घरों से बाहर निकलना दूभर हो जायेगी ।
घरों से बाहर निकलना दूभर हो जायेगी ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

सब यहीं धरा रह जायेगा

मिट्टी का यह बना शरीरा,

मिट्टी में मिल जायेगा।

न कुछ तेरा न कुछ मेरा,

सब धरा यहीं रह जायेगा।

ये रुतबा धन दौलत तेरा,

शोहरत काम न आयेगा।

दो दिन की यह भरी जवानी,

राख में सब मिल जायेगा

क्यों करता नादानी बंदे,

क्या तू लेकर जायेगा।

मिट्टी का है बना ये काया,

मिट्टी में मिल जायेगा।

राम नाम का भजन कर बंदे,

वो ही पार लगायेगा।

छोड़ दे अपनी हठ को बंदे,

हठ में तू जल जायेगा।

सब यहीं धरा रह जायेगा,

सब यहीं धरा रह जायेगा ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

कालजयी

गरीबी में पले बढ़े, गाँव की मिट्टी में पलकर जवान हो गये । मिट्टी का खपरैल घर, बारिश पानी और धूप ताप से बचाता था। माँ के हाथों बनी रोटी साग का स्वाद बेमिसाल था। खेलते खाते बचपन कब गुजर गया पता ही नहीं चला। मैट्रिक पास किया और शहर में नौकरी करने चला गया । नौकरी तो मिली पर माँ के हाथों की रोटी छूट गयी । महीने महीने मनीआर्डर घर भेजता रहा । माता-पिता को थोड़ा सुख जरूर मिला। अभी तो दुनियाँ शुरू ही हुई थी, कि पिता का साया सिर से उठ गया । घर पर ताला डाल माँ को साथ ले आया । अपनी हाथों की जली रोटी से छुटकारा मिल गया और माँ के हाथों गरमा गरम रोटी सब्जी खाकर संतुष्ट हो जाता। माँ भी कितने दिनों तक रसोई बनाती, बूढ़ी काया अब आराम चाहती थी और घर में बहू रानी आ गयी । हॅसते गाते समय पंख लगा कर उड़ रहा था । बच्चों की किलकारी और दादी माँ के खिलौने ने घर को स्वर्ग बना दिया । उस दिन माँ बहुत खुश थी, अपने पोते पोती को स्कूल जाते देख कर। पर एक दिन सात साल के पोते और चार साल की पोती को सुलाकर खुद चिरनिद्रा में सो गयी । ऐसी मृत्यु जिसने कभी चारपाई पर आसक्त नहीं हुई, हमें पानी पिलाने का भी मौका नहीं दिया । ऐसी कालजयी थी माँ । उन्हें शत-शत नमन ।

सुरेश मंडल

बंगलौर

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

बेटों को नसीहत

छोड़ देते हैं नालायक बेटे, अपने माँ-बाप को बुढ़ापे में ।

जिसने अपनी हड्डियां गलायी थी, उन चिलचिलाती सर्दी व धूप में ।

सिर्फ़ उन बच्चों को एक कामयाब इनसान बनाने के लिए ।

भूखी माँ गुजारी थी कितनी रातें, उन बेटों को खिलाने के लिये ।

तन पर फटे वस्त्र थे उनके, उन ठिठुरती ठंड की रातों में ।

पर बच्चा गहरी नींद में सोता था, ऊनी कंबलो को ओढकर।

आज भी वही हालात है माँ बाप का, बेटा मजे में सोता है रजाई ओढकर।

माँ बाप बिलखते और ठिठुरते हैं, उसी छपरैल के मकान पर।

आँखों से दूर परदेशी हो गया है, माँ बाप को भूला कर ।

सिलसिला चलता आ रहा है, चलता ही रहेगा भविष्य में ।

माँ बाप चाहे अमीर हो या गरीब, तरस रहे हैं बुढ़ापे में ।

औलाद की बेवफाई पर, जो उन्हें भूल जाते हैं अपनी कमाई पर।

अमीरों को भी रोते देखा है, उनके आलीशान बंगलों पर ।

औलाद की बेवफाई पर, उनके घर छोड़ चले जाने पर।

बुढापा तो एक दिन सभी का आना ही है,

पर अपने बुढापे को क्यों अभी से बुलाना है ।

कम से कम अपना तो सोच, माँ बाप का साथ साथ रहना ।

उनकी खुशी के साथ ही, तुम्हारे बच्चों के लिए होगी प्रेरणा।

वो भी तुम्हें देंगे मान सम्मान, रहोगे उनके साथ साथ ।

रहोगे अपने बच्चों के साथ साथ, ता उम्र अपने बुढ़ापे में ।

रहोगे अपने बच्चों के साथ साथ, ता उम्र अपने बुढ़ापे में ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

यादें

याद आता है बचपन का वो जमाना, पचास के दशक में गाँवों का वो यादगार नजारा । खुला खुला घर आँगन, तुलसी चौड़ा वाला । जहाँ माँ और दादी नितदिन सुबह-सुबह नहा धोकर उगते सूरज को तुलसी पर जल चढ़ाते, सुखी परिवार और बच्चों के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते ।

क्या कुछ नहीं था उन दिनों हमारे गाँव में? हरी भरी लहलहाती मक्के, गेहूँ चने और छिमियो से लदी झुकी झुकी अरहर की फसलें, घरबारी में लत्तरो वाली फली, तोरी, सेम, कद्दू, खीरा, पौधों में लटकते बैगन टमाटर मिरची और फलदार पपीते, अमरूद, सीताफल तथा रसीले कागजी नींबू । द्वार पर बैलों की जोड़ी और दुधारू गायें । लगभग हर घर की यही कहानी थी। न अन्न की कमी न फल सब्जी दूध दही की ।

हर घर का अपना हलवाहा हुआ करता था जो खेतों की जुताई कोराई बुवाई कटाई सभी काम किसानों के साथ मिलकर किया करते थे । पूरा गाँव एक दूसरे को जानते पहचानते थे। दुख सुख , शादी ब्याह, मरनी हरनी सभी में एक दूसरे के साथ-साथ खड़े रहते थे। पूरा गाँव एक परिवार की तरह रहते थे। उन दिनों हमारे गाँवके आसपास घने घनघोर जंगल थे। जंगली पशुओं की भरमार थी, फलदार वृक्ष और इमारती लकड़ी के पेड़ों से जंगल भरा भरा था। वर्षा रानी खेब बरसती थी, कभी-कभी सावन भादों में सात सात दिनों तक सुरज नहीं दिखाई देता था और यही दिन किसानों के लिये बहुत ही दुखदायी होता था । मवेशियों लिये चारा और उसे बरसात से दिन रात बचाना, बहुत ही कठिन होता था।

पर आज सब कुछ बदल गया है, गाँव की वो रौनक वीरान हो गयी है, लकड़ियों के लोभ में जंगल उजाड़ दिये गये । वर्षा रानी रूठ गयी है, किसानों के बच्चे गाँव छोड़ शहर पलायन कर रहे हैं, गाय बैल गाँव से नदारद हो गये हैं ।कुछ ही किसान वहाँ रहकर खेती कर किसी तरह अपना गुजारा कर रहे हैं । न वो चहल पहल है न वो खुशहाली । हाँ एक जबरदस्त तरक्की हुई है सभी कच्चे मकान पक्के मकानों में तब्दील हो गये हैं, भाईचारा नदारत है । सभी अपने अपने में सिमट गये हैं । आधुनिकता के युग में पढ़ा लिखा नौजवान खेतों पर काम करना शान के खिलाफ समझते हैं, भले ही शहरों में ओटो रिक्शा चला रहा हो या फ्लैट पर सिक्योरिटी गार्ड ।

बचपन अपना कितना सुहावना था याद करके आज भी मन रोमांचित हो जाता है । गाँव के रहने वाले सभी शहरी भाईयों को समर्पित ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।