Monthly Archives: October 2020

पत्थर दिल इनसान

पत्थर तो युगों युगों से पत्थर ही है ,
पर इनसान भी आज पत्थर बन गया है ।
पत्थर का दिल और पत्थरीली मुस्कान,
कहाँ खो गया है उसका इनसानी ईमान ।
बुत की तरह वह भी पत्थर बन गया है,
माँ बाप को भूलकर पत्नी का हो गया है ।
पत्थर तो पत्थर है समझ में आता है ,
इनसान का पत्थर होना समझ नहीं आता है ।
पाशान युग बीते तो हजारों साल हो गये हैं,
पर आज इनसान खुद पाशान बन गये हैं ।
हाथ पैर चलते हैं आँखे भी झपकती हैं,
पर दिल बिलकुल पत्थर के हो गये हैं ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

स्त्री पुरुष की सार्थकता

हम उलझे हुए हैं एक दूसरे से, एक दूसरे को समझने के लिए ।
यह समझकर कि हम दोनों अलग-अलग हैं ।
पर सच्चाई यही है कि, हम दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।
इसी लिये तो शिवशंकर भी अर्धनारीश्वर कहलाते हैं ।
न पुरुष अलग है स्त्री से, न स्त्री अलग है पुरुष से।
दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों का साथ ही सृष्टि की सार्थकता है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

शमशान

कफन और दफन , किसी के लिये नहीं बना है अलग अलग ।
शमशान में सभी का स्वागत एक ही तरीके से होता है ।
क्या गरीब क्या अमीर, क्या राजा क्या रंक, सभी बराबर एक है।
बिन वस्त्र के खुले हाथ सब, लेटे बिस्तर एक है।
राजा और भिखारी आकर, हो जाते सब एक है।
फिर भी इनसा नहीं सोचते, जीते जी घिसते रहते हैं।
घुट घुट कर जीते रहते हैं, औरों को दुःख देते हैं।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

पत्थर दिल

पत्थर दिल इनसान यहाँ पर,
पत्थर की वो पूजा करता।
माँ बाप को भूखा रखता ,
मूरत को वो भोग लगता ।
धूप दीप आरती वो करता,
माँ के आँसू उसे न दीखता।
नवरात्रि पर कन्या पुजता,
बलात्कार उसका वो करता ।
पत्थर दिल इनसान यहाँ पर,
उसको इनसा कहीं न दीखता।
उसको इनसान कहीं न दीखता।
जयभारत वन्देमातरम जयहिन्द

दूसरी पारी

चलो अब अपनी जिंदगी की दूसरी पारी का आनंद लेते हैं ।
बच्चे गये अपने घोसले में, अब वो लौटने वाले नहीं हैं ।
चलो हम दोनों मिलकर, आज से चाय पकौड़ी बनाते हैं ।
तुम कढ़ाई में पकौड़ी डालना, मैं छान कर निकालता हूँ ।
तुम सब्जियां बनाना, मैं सब्जियों को काटकर धोता हूँ ।
साथ साथ चाय पीयेंगे हम, जो जिंदगी नहीं जी पाये हैं।
उसे हम अब खुशी खुशी जीने की कोशिश करेंगे ।
यह हमलोगों की दूसरी पारी है, इसे हम भरपूर जीयेंगे ।
खुद बनायेंगे भोजन, मिलकर साथ साथ खायेंगे ।
न कल की चिंता न आजका झंझट, हम खुशी खुशी जीयेंगे ।
हम खुशी खुशी जीयेंगे ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

आजादी

न पुरुष आजाद है यहाँ , न स्त्री है गुलाम ।
एक दूसरे के साथ साथ, दोनों हैं बदनाम ।
होते गर आजाद दोनों,न होती ये दुनियाँ आबाद ।
कौन किससे पूछता यहाँ, कहाँ होते इनसान ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

चालीस पचास का दशक

चालीस पचास का दशक

दो से तीन जोड़ी कपड़ों से अधिक, उस समय हम बच्चों में भी, सभी के पास नहीं हुआ करते थे । इन्हीं कपड़ों में स्कूल जाना, तीज त्यौहार, मेले घुमना, शादी व्याह पर भी इसी से काम चलाना आम बात थी। नये कपड़े तभी मिलते थे जब पुरानी पहनने लायक नहीं रह जाती थी। पर इन्हीं कपड़ों और तख्ती या स्लेट पेनसिल से पढ़ाई कर, अपने पैरों पर खड़ा होने का, हमें गर्व है कि हम अपने देश की उन्नति में भागीदार हैं। भाई कुछ भी कहो पर वो जिंदगी मस्त थी। खाने पीने के लिये पर्याप्त साक भाजी, फल और माँ के हाथों बनी मोटे अनाज की मक्खन लगी रोटी दही गुर के साथ और सुबह शाम गाय की थनों से निकाली गरमा गरम भर गिलास दूध पीना । कितना स्वादिष्ट होता था वह आज भी याद आती है । पहाड़ों पर घुमना, बाग और खेतों पर जाना, माँ बाप के कामों में हाथ बटाना, और गुरू जी की डंडे की हम सभी बच्चों की पिटाई क्या हम भूल सकते हैं ? पर उन्हीं गुरू ने हम गीली मिट्टी को इतना अच्छा स्वरूप दिया, कि आज हम खुशहाली की जिंदगी जी रहे हैं और अपने परिवार तथा बच्चों को ऊँची शिक्षा दे रहे हैं । बचपन बड़ा सुहाना था, ये यादें बहुत निराली है और हम सब इसकी आखिरी पीढ़ी हैं, जो इस देश को आजाद होते देखा, गरीबी और मुसीबतों से लड़ते आगे बढ़ते देखा और आज खुशहाली की डगर पर संसार में अपना नाम ऊँचा करते देख रहा हूँ । हमें अपनी उस पीढ़ी का होने पर गर्व है, क्योंकि इस देश की तरक्की में हमारा भी योगदान है

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

वह बोल पड़ी

वह एक साल की गुड़िया थी, जब घुटने घुटने चलती थी।

ठुमक-ठुमक कर चलती थी, तुतला तुतलाकर कहती थी।

एक दिन घर में बिल्ली आयी, मियायू मियायू कर घूमती थी।

उसे देख छोटी गुड़िया, वह बड़े जोर से चिल्लाई ।

बिल्ली दूदू पीने आयी, वह बोल पड़ी वह बोल पड़ी ।

माँ माँ कर वह चिल्लायी, वह जोर से मामा बोल पड़ी ।

पाँच साल की गुड़िया अब, स्कूल जाती है पढ़ती है ।

हिन्दी में कविता गाती है, इंगलिश में पोइम पढ़ती है ।

कुछ कहने कुछ पूछने से, पहले वो हमसे बोल पड़ी ।

आजादी का पर्व हमारे, स्कूल में होने वाला है ।

माँ भारती तुमको बनना है, टीचर ने हमको बोला है ।

वह बोल पड़ी वह बोल पड़ी, हमको साड़ी में जाना है ।

तुम मुझे बना दो मुझे सजा दो, भारत माँ का मुकुट लगा दो।

हमको कल स्कूल जाना है, वह बोल पड़ी वह बोल पड़ी ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

नारी सृष्टि का मूल है

ये बंधन वास्तव में कोई बंधन नहीं है,
यह है वो डोर जो हमें बिना बांधे ही बांधती है ।
जो न दिखती है न दिखायी देती है,
पर है वह एक अटूट बंधन जो हमें बांधती है ।
आपस में जोड़ती है उस अनदेखी डोरी से,
प्रेम के बंधन से, न अलग होने के लिये ।
पति पत्नी न कभी अलग थे न अलग हैं,
वे दो शरीर जरूर हैं पर एक ही जान है उसमें।
सृष्टि की शुरुआत से ही दोनों एक साथ हैं,
एक की जरुरत घर के अंदर है दूसरे की बाहर ।
एक कोमल है तो दूसरा पत्थर की तरह कठोर,
ये काम का बंटवारा नहीं है पर हकीकत है ।
दोनों का बाहर कमाई करना घर की जरूरत नहीं,
दोनों मिलकर साथ साथ घर में खुशहाल रहे।
बच्चों को शिक्षित और संस्कारित करते रहे,
धन दौलत की कोई सीमा नहीं होती है।
करोड़ों कमाई करने वाले भी दुखी देखे जाते हैं,
मुट्ठी भर कमाने वाले भी खुशहाली में जीते हैं ।
पति पत्नी में प्यार हो तो गरीबी में भी सुख है,
दोनों में मन मुटाव हो तो अरबपति भी दुखी रहते हैं।
शिक्षित होना जरूरी नहीं नौकरी करना ही है,
शिक्षा के सामने तो हीरा भी एक मलीन गहना है ।
शिक्षित नारी अपनी संतानों को शिक्षित करती है ,
वह घर में रहती है तो घर परिवार सुरक्षित रहती है ।
इसीलिये तो नारी दुर्गा लक्ष्मी और सरस्वती है।
इसीलिये तो नारी दुर्गा लक्ष्मी और सरस्वती है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

भूल जाते हैं

क्लास फैलो स्कूल और कॉलेज तक के साथी होते हैं ।

ग्लास फैलो जीवन के आखिरी सांस तक साथ निभाते हैं ।

वो बचपन की दोस्ती जवानी में कहाँ याद रहते हैं ।

ग्लास हाथ में हो तो साथ देने वाले ही याद रहते हैं ।

वो नटखट पन, वो निक्करो में घूमना वो बचपन की दोस्ती ।

वो झिलमिलाते चेहरे, वो स्कूल की शरारत, वो मस्ती ।

अब कहाँ याद रहते हैं, जब हाथों में जाम होते हैं ।

जब साकी जाम पिलाती है, तो हम सफर को भी भूल जाते हैं।

हम सफर को भी भूल जाते हैं, हम सफर को भी भूल जाते हैं ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।