Monthly Archives: August 2020

परेशान

रमेशरी आज काफी परेशान थी। दो दिन हो गये हैं, उसका पति रमेश काम से वापस घर नहीं लौटा है । आस पड़ोस वालों से भी पता किया, पर उनलोगों को भी कुछ पता नहीं था। उसकी नयी नयी शादी हुई है, उसके लिए यह जगह अनजान थी , क्या करे या न करे यही सोच सोचकर वह परेशान थी । तभी उसका देवर देवेश आया और भाभी को गाँव चलने को कहा। रमेशरी को बताया कि दो दिन पहले माँ की तबियत अचानक खराब हो गयी थी। गाँव के डाक्टर की दवाई चल रही थी , पर कल अचानक ही माँ का देहांत हो गया, भैया के आफिस में बात बताई गई और भैया आपको बिना बताये उधर से ही गाँव चले गये थे। कल माँ का अंतिम संस्कार करने के बाद आज मैं आपको लने आया हूँ ।भैया ने मुखाग्नि दी है, अतः वे घर से बाहर नहीं निकल सकते हैं । रमेशरी सासुमा की निधन की खबर सुनकर भौचक रह गयी और उन्हें यादकर वह फूट-फूट कर रोने लगी । पड़ोसी घर आ गये और यह जानकर उन्हें तसल्ली हुई कि रमेश सही सलामत है। उनलोगों ने रमेशरी को ढाढ़स दिया और देवर के साथ गाँव जाने में मदद की । दो दिन से परेशान रमेशरी पति के सकुशल गाँव में होने पर ईश्वर को धन्यवाद दिया और देवर के साथ गाँव लौट गयी ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

जीवन की संध्या

क्या हुआ, आज इतनी देर तक सो रही हो। तबियत तो ठीक है न। हरि अपनी पत्नी को जगाते हुए पूछा। लो उठो फ्रेश होकर आओ, चाय बनायी है गरमा गरम साथ में पीते हैं। मीता अनमने से उठाकर वाश रूम चली जाती है। फ्रेश होकर टेबिल पर आकर साथ साथ चाय पीने लग जाती है। चाय पीते पीते दोनों आपस में बातें करने लगे। मीता बोली, देखो घर कितना सूना सूना लग रहा है। कल तक रवि बच्चों के साथ यहाँ था। घर में कितनी रौनक और चहल पहल थी।उसके जाते ही घर वीरान हो गया। हरि उसे समझाते हुए बोला, देखो हमलोगों के पास न तो पुस्तैनी खेती के जमीन जायदाद है और न व्यापार या दुकान। अच्छी नौकरी अपने शहर में तो मिलनी मुश्किल है, उसे परदेश में अच्छी नौकरी मिली है। परिवार के साथ खुशहाली से रह रहा है। साल में दस पन्द्रह दिनों के लिये बच्चों समेत आ जाता है। हमलोग भी बीच बीच में मिलने चले ही जाते हैं। यही जिंदगी है और याद करो हमलोग भी नौकरी के लिये अपना गाँव घर छोड़कर यहाँ शहर आ गये थे। माँ पिता जी को उस समय कितनी तकलीफ हुई थी, पर यहाँ आकर हमलोगों की गृहस्थी देख कर कितने खुश हुए थे। अब हमलोगों को भी ऐसे ही जीना है। खुश रहा करो, बच्चे रोज रोज टेलीफोन पर बात भी करते ही हैं ।मन छोटा मत करो, आस पड़ोस मित्र बन्धु से मेल-मिलाप भी अच्छा है। कभी कोई परेशानी होगी तो हम सभी को एक दूसरे का सहारा तो है। चलो उठो थोड़ा बाहर बाग में घूम आते हैं मन बहल जायेगा। हम साथ साथ हैं और ऐसे ही पूरी जिंदगी रहेंगे ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

पिकनिक

भाई सच कहें तो पुरुषों के लिये ये करोना वरदान होकर आया है । पिछले पांच महीनों से घर में बैठे बैठे आईटी वाले काम कर रहे हैं ।सुबह से शाम कम्प्यूटर लैपटॉप पर बैठ जाते हैं और शुरू हो जाती है उनकी पिकनिक । घर वाली बेचारी कीचन में व्यस्त कभी गरमागरम चाय नाश्ता, कभी चटपटी मसाले दार नमकीन, विभिन्न प्रकार के व्यंजन । सुबह कुछ तो दोपहर कुछ सब अलग-अलग । शाम तो सुहानी होनी ही है, गरमागरम कभी आलू टिक्की, कभी गोभी पकौड़ी, कभी चटपटी चाट, कभी पनीर और मिर्ची पकौड़ी साथ में गरम गरम चाय,या काफी। भोजन भी तरह तरह के । चावल दाल रोटी पराठे तो आम बात है । कभी भेज पुलाव, तो कभी नानभेज । कभी चीकन फ्राय, तो कभी तरीदार चीकन या सरसों वाली रेहू कतला मछली । मलाई दार कोफ्ते, तो कभी आलू भरी शिमला मिर्च , मटर पनीर या पालक पनीर, हलवा , खीर या सेवइयों की मीठी कटोरी भी साथ साथ ।

अब कहो ये पिकनिक नहीं है तो क्या है? भैया करोना ने तो कमाल ही कर दिया है । घरवाली इसलिये खुश है कि रात दिन पति और बच्चों का साथ है । न मौल जाना न ब्यूटीपारलर ।घर खर्च में बचत और खुशियाँ ही खुशियाँ । सारी मार्केटिंग आन लाइन , घर पर आ जाती है । कपड़े बेचारी हैगर में लटके लटके रो रही हैं ।महीनों से उसे कोई पहना ही नहीं । धोबी और प्रेसवाला बेरोजगार, सैलून और ब्यूटी पार्लर वाले रो रहे हैं । होटल रेस्तरां बन्द हो गये हैं ।

पर रोज मर्रा की जिंदगी में जबरदस्त बदलाव आया है । लोग सफाई और स्वास्थ्य पर पूरा ध्यान दे रहे हैं । अपने अपने घरों में ही रहकर करोना से लड़ रहे हैं और पिकनिक मना रहे हैं ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

बाजार की निरंतरता

परिवार कैसे बाजार पर निर्भर करता है, यह आप एक मकान की बिक्री से समझ सकते हैं । एक बेचने वाला होता है और दूसरा खरीदने वाला । उस मकान को बेचने में मदद करने के लिए बिचौलिया होता है । एक लोकल और एक बाहरी। बाहरी वाला बिचौलिया लोकल बिचौलिया को उसके इलाके में मकान के लिये ग्राहक देता है । दोनों मिलकर ग्राहक को मकान मालिक से सौदा तय करवाता है । दोनों के बीच ये समझौता होता है कि ग्राहक देने वाला अपने ग्राहक से कमीशन लेगा और मकान दिखाने वाला बेचने वाले से कमीशन लेगा ।

फिर एडवोकेट के द्वारा रजिस्ट्री की सारी कारवाई पूरी की जाती है । इस तरह सिर्फ़ एक खरीददार के द्वारा, दिये गये रुपयों से सीधे तौर पर चार चार परिवारों की रोजी-रोटी चलती है ।

अगर ये खरीद बिक्री नहीं होती तो ऐसे परिवार का भरण-पोषण कैसे हो सकता है? यही बाजार की निरंतरता है और ऐसे ही पूरी की पूरी व्यवस्था अनवरत चलती रहती है । निरंतरता में ही समाज की प्रगति है। ठीक नदी की जलधारा की तरह — बहता पानी निर्मला बंधा गंदा होय।

बाजार में जितना अधिक खरीद बिक्री होगी, समाज और देश उतना ही उन्नत शील होगा । जनता की क्रय शक्ति जितनी अधिक होगी, देश उतना ही आर्थिक रूप से मजबूत होगा । इसके लिए जनता की मांग के अनुरूप देश में उत्पादन होती है और लाखों लोगों को रोजगार मिलता है । सभी एक दूसरेके उपर निर्भर करते हैं और यही आत्म निर्भीकता है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

गणेश जी की आरती

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।

माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।

मूस के सवारी जाकी भक्तन के देवा।

दूब चढ़े पान चढ़े और चढ़े मेवा।

लडुयन के भोग लागे संत करे सेवा ।

जय गणेश जय गणेशजय गणेश देवा।

गणेश वंदना

गौरी नन्दन गणेशम गणेशम,

शंकर सुतम गणेशम गणेशम ।

गिरिजा पुत्रम गणेशम गणेशम ।

प्रथम पूजनीय गणेशम गणेशम ।

लब्मोदरम गणेशम गणेशम ।

बिघ्नविनाशक गणेशम गणेशम।

बुद्धिदाता गणेशम गणेशम ।

विद्या दाता गणेशम गणेशम ।

सबके त्राता गणेशम गणेशम ।

गणेशम गणेशम गणेशम गणेशम ।

गणेशम गणेशम गणेशम गणेशम ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

भ्रम में जीती ये दुनियाँ है

भ्रम जाल ये सारी दुनियाँ है,
भ्रम में जीती ये दुनियाँ है।
बेटी बेटा पत्नी अपनी ,
ये अपना नहीं पराया है।
माँ बाप छोड़ कर चले गये।
हमें इन्हें छोड़ कर जाना है।
सुख के साथी हैं सभी यहाँ,
दुःख बाँटने वाला कोई कहाँ।
भ्रम जाल ये सारी दुनियाँ है,
भ्रम में जीती ये दुनियाँ है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

एक दिन सबकी यही कहानी

दुःख भरी दास्तान है, कितने ही परिवार की ।
सुख का है सब साथी भाई, दुःख में साथ नहीं है कोई ।
पैसा है भगवान यहाँ पर, सारे रिश्ते पैसों का।
सेवा भावना नहीं रहा है, बेटा बेटी अपनों का ।
निर्बल काया बूढ़ी देह, दूर रहे सब इनसे लोग ।
सेवा करना साथ निभाना, नहीं चाहते अपने लोग ।
ईश्वर की ये बात निराली, सबकी एक दिन यही कहानी ।
फिर भी युवक यही सोचते, हमरी तो है भरी जबानी।
काल का पहिया घूमे भइया, एक दिन सबकी यही कहानी ।
एक दिन सबकी यही कहानी, एक दिन सबकी यही कहानी ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

जीवन अभी भी बांकी है

बीत गया जी बीत गयाअब,
तीन पहर तो बीत गया ।
चौथे पन की शाम हो चली ,
कब ढल जाये कब ढल जाये ।
अभिलाषा अभी भी बांकी है,
जी गिनती गिनना जो बांकी है ।
कहाँ कहाँ किन बैंको में,
लौकर और संदूकों में ।
प्लाट फ्लैट किन शहरों में,
बेटों के नाम या अपनों में ।
किसको क्या क्या देना है,
किससे कितना अब लेना है ।
ये गिनती गिनना बांकी है,
ये गिनती गिनना बांकी है ।
ये आखिरी शाम की वेला है ,
फिर भी जीने की आशा है।
गिनती गिन गिन कर जीया है ।
मरने तक गिनती गिनना है ।
ये गिनती राम का गिन पाते,
ये गिनती श्याम का गिन पाते ।
तो और न गिनती गिननी थी,
प्रभु नाम की गिनती काफी थी।
जनम जनम के मीत हमारे,
जन्मों के वो साथी है ।
विनती उनकी कर ले प्यारे,
कुछ जीवन अभी भी बांकी है ।
बांकी गिनती छोड़ के प्यारे,
प्रभु की विनती कर ले प्यारे।
गिनती गिनना छोड़ दे प्यारे,
प्रभु की विनती कर ले प्यारे।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

सिन्धी भाई

सिन्धी भाई छोड़ सिन्ध को,

भारत का जो प्रहरी था।

पश्चिम छोर का द्वार पाल वो,

धन धान्य से भरपूर था।

मालामाल सिन्ध के वासी,

धन दौलत सब छोड़ वहाँ।

अपने देश में बने शरणार्थी,

हिन्दू धर्म व देश बचाने वो आये।

अपने ही बलबूतों पर वे,

घर यहाँ वो बसा पाये।

आज हमारे सिन्धी भाई,

भारत के शुभचिंतक हैं ।

देश विकास में सबसे आगे,

सिन्धियो का ही दसखत है।

छोटे बड़े काम धंधों में ,

वो तो सबसे बेहतर हैं।

वो तो सबसे बेहतर हैं ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।