Monthly Archives: December 2020

नूतन वर्ष मंगलमय हो

बीत गयी ये साल पुरानी,

बीस बीस की बिष वाली।

पूरे साल सुलाया घर में,

जाते जाते रूला दिया ।

पूरे साल ये कैद में रक्खा,

मुँह छिपाना सिखा दिया ।

दूर-दूर रहना है सबको,

हाथ जोड़ना सिखा दिया ।

बेटी के घर आने को भी,

इसने सबको मना किया ।

बंद कर दिये बस वो रेल,

हवाई जहाज भी बंद किया ।

घर घर में मायूसी छायी ,

कितने हमसे बिछड़ गये ।

करोना ने तोड़ा है सबको,

काम धंधा भी बंद किया ।

आने वाला नूतन वर्ष,

मंगलमय हो हम सबका।

यही दुआ करते ईश्वर से,

अब नया वर्ष मंगलमय हो ।

अब नया वर्ष मंगलमय हो ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

नूतन वर्ष मंगलमय हो ।

मीठे मीठे बोल

कागा की कर्कश बोली पर, करते हैं सब जन नफ़रत ।
पर कागा के निर्मल काम से, नहीं आवगत जन मानस ।
सड़ी गली चीजों को खाती, करती नितदिन रोज सफाई ।
मरे हुए और गले हुए भी, जानवर खाते कागा ही।
बिन कागा के नहीं सफाई, यहाँ कोई कर सकते हैं ।
कोयलिया मीठी बोले तो, हम सब खुश हो जाते हैं ।
उसकी करनी को भी हम सब , मीठी बोल में भूलते हैं ।
कौवा के अंडों को कोयल, फेक घोसले से बाहर ।
अपना अंडा छोड़ वहाँ पर, कौवा को वो ठगते हैं ।
कहो कहाँ से ऐसी नीचता, कोयल में कब आयी है ।
फिर भी कोयल प्यारी हमको, कागा हमें न भायी है ।
बात पते की सुनलो भैया, कर लो कितना प्यारा काम ।
बोली जब कर्कश हो भैया, नहीं प्यार व नहीं इनाम।
मीठी मीठी बोलो भैया, प्यार से सब कोई मिलता है ।
मीठे-मीठे बोल में भैया, अपनापन सा लगता है ।
सब अपनापन सा लगता है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

मिट्टी और माँ

मिट्टी सिर्फ़ मिट्टी होती है, न वह अच्छी होती है न बुरी होती है ।
एक ही खेत में कई तरह के पौधों के बीज बोये जाते हैं ।
मिट्टी तो एक ही रहती है, पर अलग-अलग बीज से अलग पौधे उगते हैं ।
उनकी पत्तियां फूल और फल, सब उनके बीज वाले गुणों के होते हैं ।
कोई फल मीठा रसीला तो कोई कडुआ कसैला होता है ।
कोई पौधा पौधा ही रह जाता है, तो कोई लता और पेड़ बन जाता है ।
मिट्टी सभी पेड़ पौधे और लताओं को समान रूप से पोषित करती है ।
पर सभी पौधे अपने बीज का ही रूप धारण करते हैं ।
माँ भी सिर्फ़ मिट्टी की तरह मात्र मिट्टी ही होती हैं ।
बच्चे अपनी माँ के हाड़ मांस और खून से पोषित होते हैं ।
पर उसका गुण पिता की तरह ही होता है, वह पिता की ही प्रतिकृति होते हैं ।
माता-पिता के गुण दोष से ही जीवन धारण करते हैं ।
वैसे ही पलते और बढ़ते हैं, एक के बिना दूसरा अधूरा होते हैं ।
माँ माँ होती हैं और पिता पिता, बच्चे तो दोनों के प्यार से ही पलते हैं ।
बच्चे माता-पिता के प्यार से ही पलते हैं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

जूते की अभिलाषा

चाह हमारी इतनी भर है, फौजी का जूता बना रहूँ ।
उनके पैरों की शोभा बन,मैं साथ सदा ही रह पाऊँ ।
साथ निभाऊ तबतक उनका, जबतक मैं खुद टूट न जाऊं ।
खुद काटों पर चलूँ साथ मैं , उन्हें न काँटे लगने दूँ।
बरफ के ऊपर साथ चलूँ मैं, तपती रेत से उन्हें बचाऊ।
गद्दारों के सिर की शोभा और गले का हार बनू।
मैं जूता हूँ मैं जूता हूँ, मैं भारत देश का जूता हूँ ।
मैं भारत देश का जूता हूँ ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

बड़े बनें अकेला न रहें

जीवन न सिर्फ़ ऊँचाई पर है न तराई पर।
जीवन का श्रोत तो है सिर्फ़ ऊँचाई पर।
न होते ये ऊँचे बर्फीले पहाड़ ,
तो जमीन पर ये नदियाँ न होती ।
ये नदियाँ न होती तो ये दुनियाँ न होती ।
न होते पेड़ पौधे न होते जंगली जानवर ।
फिर न होते यहाँ इन्सानो का समुन्दर ।
बड़ा होना भी लाभकारी होता है ।
बड़े ही तो झुकते हैं देने के लिये ।
बौने झुक कर किसे क्या दे पायेंगे ।
बड़े बनें उदार बनें दूसरों का सहारा बनें ।
बड़े बनें साथ साथ मिलकर रहें ।
पर बड़े बनकर कभी अकेला न रहें ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

कल को किसने देखा है

आज आज की सोच रे बंदे, कल को किसने देखा है ।
जोड़ जोड़ कर रक्खा धन को, मन को क्यों तुम दुखी किया ।
आज आज की सोच रे बंदे, आज तुम्हारा अपना है ।
धरा सभी धन यहीं रहेगा, काम न तेरा आयेगा ।
कल की बात करें न बंदे , कल को किसने देखा है ।
कल को किसने देखा है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

गाँव अब शहर बन गया

सच तो यही है, कुछ का मन टूटा, तो कुछ का भ्रम टूटा।
कुछ ने बगावत की और कुछ ने समझौता किया ।
गाँव का अपनापन गया और शहर में रहना हुआ ।
लकड़ी और उपले की आग, मिट्टी का चूल्हा गया ।
बैलों की जोड़ी लकड़ी का हल, हलवाहा भी गया ।
बीघे बीघे आमराई गयी, गाँव की कच्ची सड़क गयी ।
झोपड़ी और मिट्टी का मकान, सब कुछ बदल गया ।
घूँघट वाली बहुरिया अब सलवार सूट वाली हो गयी ।
पक्का मकान गैस वाला चूल्हा, घर में बिजली आ गयी ।
गाँव का अपनापन गया और शहरी बाबू बन गया ।
पढ़ लिखकर खेती कौन करे, शहर जाकर बस गया ।
खेत बीरान मकान सुनसान हो गया, गाँव अब शहर बन गया ।
गाँव अब शहर बन गया । गाँव अब शहर बन गया ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

मैं बड़ी हो गयी हूँ

माँ अब मैं बड़ी हो गयी हूँ,

बाबा की प्यारी गुड़िया, मम्मा तेरी दुलारी बिटिया ।

दादा की फुदकी चिडैया, दादी की छुटकी गौरैया ।

कल तक घुटने घुटने चलती थी, फ्राक पहन स्कूल जाती थी ।

भाई से लड़ाई करती और उसे खूब सताती थी।

पर माँ अब मैं बड़ी हो गयी हूँ ।

कल ही तो व्याह हुआ है मेरा, मैं अब लड़की से बहू बन गयी हूँ ।

कल तक जो तेरी हाथों की बनी बनायी रोटियाँ खाती थी।

उस पर भी सौ नखरे दिखाती थी, आज खुद रोटी बना रही हूँ ।

माँ अब मैं बड़ी हो गयी हूँ ।

देर रात तक जगने वाली, तेरी वो नटखट बिटिया ।

सुबह देर तक सोने वाली, और ढेर सारे नखरे दिखाने वाली ।

अब भी देर रात को सोती हूँ, पर घर के सारे काम निपटा कर ।

सुबह सवेरे ही उठ जाती हूँ, रसोई जल्दी से बनाती हूँ ।

उन्हें नाश्ता खिलाकर, लंच बाक्स पैक कर देती हूँ ।

माँ अब मैं बड़ी हो गयी हूँ ।

तुम्हारे लाड ने मुझे गुड़िया ही बना रक्खा था।

बिटिया अभी छोटी है, धीरे-धीरे सब सीख जायेगी ।

पर माँ वहाँ मैं सदा गुड़िया ही बनी रही, कभी तुम्हें सहारा नहीं दे पायी ।

आज मुझे बहुत रोना आता है, वहाँ मैं क्यों न बड़ी बन सकी।

तुम्हारी हाथों की बनी बनायी रोटियाँ ही खाती रही ।

माँ ऐसा क्यों होता है, बेटी परायी होते ही क्यों बड़ी हो जाती है ।

माँ अब मैं सचमुच ही बड़ी हो गयी हूँ।

तुम्हारी लाडली अब गुड़िया नहीं, गुड़िया की माँ बन गयी हूँ ।

माँ अब मैं बड़ी हो गयी हूँ । माँ अब मैं बड़ी हो गयी हूँ ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।