अपना बिहार कुछ ऐसा हो

अपना बिहार कुछ ऐसा हो, जहाँ खेतों में सालो भर हरियाली हो।
किसानों के माथे पर पसीना तो हो, पर ओठों पर मुस्कान हो।
कोई भी बेटी स्कूल जाने को न तरसे, और देर सवेर शाम को बेझिझक घर से बाहर निकल सके ।
अपना बिहार कुछ ऐसा हो कि कोई भी माता-पिता बेटी होने पर दुखी न हो।
बेटी ब्याहने के लिये न गैया बिके न खेत खलिहान बिके।
किसी का बेटा मजदूरी करने गुजरात व पंजाब न जाये ।
बिहार में उसके लिये भरपूर रोजगार हो, खेतों में पानी हो।
नदी नालों पर बाँध हो, आम लीची के लहलहाते बगान हो।
चीनी के सभी पुराने कारखाने फिर से चालू हो ।
भाई भाई में प्यार हो ,पड़ोसियों में तकरार न हो।
विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुत्थान हो।
भारत ही नहीं पूरे विश्व में बिहार का अपना नाम हो।
हमारा बिहार ऐसा हो कि हम गर्व से कह सकें कि हम बिहारी हैं ।
हम गर्व से कह सकें कि हम बिहारी हैं, हम गर्व से कह सकें कि हम बिहारी हैं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

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माटी में ही मिल जायेगी

सब कुछ माटी से आती है, फिर माटी में मिल जाती है ।

गर्व तू किसका करता वन्दे, क्यों ऐसे इठलाता वन्दे ।

बचपन और जवानी का, या फिर हीरे मोती का।

बूढ़े होते कमर झुकेगी, हीरे मोती साथ न देगी।

बीमारी में रोते रोते, यो ही बुढ़ापा कट जायेंगी ।

चार दिनों का जीवन तेरा, फिर माटी में मिल जायेगी ।

माटी से ये बना शरीरा, माटी में ही मिल जायेगी ।

माटी में ही मिल जायेगी ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

बेटे की माँ

बेटे की माँ

एक विधवा अपनी तीन साल की बेटी के साथ बाग में टहलने आया करती थी । वहीं एक विधुर भी अपने चार साल के बेटे के साथ टहलने आया करते थे । दोनों बच्चों में दोस्ती हो गयी, वो आपस में घुल-मिल कर खेलते कूदते थे। एक दिन बच्चों ने अपने माता-पिता को एक दूसरे से मिलवाया। दोनों आपस में अभिवादन कर अपना अपना परिचय दिया।
ऐसे ही दोनों बाग में टहलते हुए आपस में मिलते रहे । महीना बीत गया, बेटे ने अपने बाप से कहा, पापा मुझे माँ और बहन का प्यार मिल गया है क्या आप उसे अपने घर ला सकते हैं? पिता सोच में पड़ गया और बोला बेटा हम इसपर विचार करेंगे । सप्ताह बाद पुरुष ने महिला से कहा, क्या आप मेरे बेटे की माँ बनना पसंद करेंगी? महिला मुस्कुराई और बोली, आप को बच्चों की माँ चाहिए या अपने लिये पत्नी? पुरुष मुस्कुराया और बोला मुझे तो बच्चों की माँ चाहिए । महिला बोली अगर आप ने अपने लिये पत्नी बोला होता तो मैं कतई इस रिश्ते के लिये हा नहीं करती । फिर दोनों एक दूसरे के आँखो में देखा और जीवन भर साथ साथ रहने के लिये फैसला कर लिया ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

हम खुशी मनाये जीवन में

आये थे अकेला जाना है अकेला, यही तो जिंदगी दो दिन का मेला ।

बचपन बीता आयी जवानी, खुशबू बन आयी तूम घर में ।

एक से हम दो हो गये ,दो होकर भी एक रहे हम।

बच्चों की किलकारी घर में, खुशियाँ लायी जीवन में ।

खुशी खुशी जीवन है बीता,क्यों रोयें हम जीवन में ।

बच्चे खुश हैं अपने घर में, हम भी खुशी मनाये घर में ।

छोड़ आश अब बच्चों की, ये दुनियाँ है हम दोनों की।

हर रोज दिवाली हो घर में, होली जैसी रंगीनी हो।

साथ साथ मिलकर घर में, हम खुशी मनाये जीवन में ।

हम खुशी मनाये जीवन में ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

अभी से मायूस न हों

उम्र पचास भी कोई उम्र होती है, जवानी ढलने की ये तो शुरुआत है ।
बाल बच्चे अभी भी आपकी आश्रय में हैं, कालेज अभी जा ही रहे हैं ।
बिटिया शादी के लायक भी नहीं हुई है, दस वर्ष नौकरी अभी बाक़ी है ।
यही तो उम्र है लहलहाती फसल को काटने की, अभी तो आप जवान हैं ।
फ़िक्र न करें अभी से, बुढापा आना अभी बांकी है ।
हॅसते मुस्कुराते गुनगुनाते रहें, अपनों के साथ मस्ती में रहें ।
दूसरी पाली आने में अभी बहुत देर है, ढलती जवानी का मजा लेते रहें ।
हो सके तो अभी से अपने बुढ़ापे के लिये खुद प्रबंध कर लें ।
बच्चों का क्या भरोसा भविष्य में वो कहाँ और आप कहाँ रहें ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

कभी नहीं एक दूसरे को भूलना

दूध और पानी का मिलना, दोनों का सदा के लिए एक हो जाना ।
यही है असल में पति पत्नी का रिश्ता, मिलकर कभी अलग नहीं होना ।
एक दूसरे के सुख-दुःख का भागी, बाहों में नहीं साँसों में बसना ।
बेटा का परदेश जाना और बेटियों का ससुराल चले जाना ।
बुढ़ापे में पति पत्नी का ही साथ रहना, यही तो है आखिरी ठिकाना ।
दो जिस्म एक जान होकर, सारी उमर साथ बिता लेना ।
पति पत्नी का ये रिश्ता है गजब, कभी नहीं एक दूसरे को भूलना ।
कभी नहीं एक दूसरे को भूलना , कभी नहीं एक दूसरे को भूलना ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

वह दंभ में रहता है

वह दंभ में रहता है

पुरुष अपनी जवानी में दंभ में रहता है ।
पिता का बना बनाया ये घर उनका है।
धन दौलत उनका है परिवार उनका है।
अपना बचपन भूलकर वह दंभ में रहता है ।
अपने माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
घर के बाहर गराज में उन्हें सुलाता है।
रूखी सूखी रोटियाँ सुबह शाम खिलाता है।
खुद घी मलाई खाता है ऐ सी में रहता है ।
अपने बच्चों को आँखों पर बिठाता है ।
पर माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
आज जो वह माता-पिता के साथ करता है ।
कल उसका बेटा भी यही करने वाला है ।
वह यह भूल जाता है वह दंभ में रहता है ।
इनसान जो बोता है वही वह काटता है ।
माँ बाप में ही भगवान है यही भूल जाता है ।
मंदिरों में घूम घूम कर भगवानों को ढूंढता है।
पत्थरों की मूर्ति में भगवानों को खोजता है ।
माँ बाप में ही भगवान है यही भूल जाता है ।
जीते जागते भगवान को हर पल रूलाता है ।
और पत्थरों के भगवान को दूध पिलाता है।
पर माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
अपना बचपन भूलकर वह दंभ में रहता है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

धरती स्वर्ग समान हो

घर घर में खुशहाली हो,

पर जीवन में गुमान न हो।
अपने पराये में भेद न हो,

सभी जन एक समान हो।
जाति पांति का भेद न हो,

धर्म सिर्फ़ इनसान का हो।
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे व,

गिरजाघर सब एक हो।
ऐसा कभी भी हो जाये तो,

दुनियाँ स्वर्ग समान हो।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

लड़कियों की आत्मकथा

जन्म लते ही दुत्कारी जाती है, करमजली कहकर बुलायी जाती है ।
रोती बिलखती टूट जाती है, अपनों द्वारा ही सतायी जाती है
भाई बाप के जूठन से पेट भरती है, माँ भी कहाँ बेटी समझती है ।
पढ़ाई लिखाई से दूर रक्खी जाती है, बचपन से ही चूल्हे चौंके में खटती है ।
कमसिन कम उम्र में ही व्याह दी जाती है, छोटी उम्र में ही माँ बन जाती है ।
औरत भी कहाँ किसी औरत के दर्द को समझ पाती है ।
पर औरत ही तो श्रृष्टि चलाती है, उसके त्याग तपस्या ही हमें इनसान बनाती है ।
औरत कभी भी वो सम्मान नहीं पाती है, जिसका वो हकदार होती है ।
छोटी उम्र में हम उसकी, नव दुर्गा रूप में कन्या पूजा करते हैं ।
बड़ी होते ही काम वासना का शिकार बनाते हैं ।
सिर्फ अपनी माँ को ही हम पूजते हैं, बांकी सबको कहाँ मान देते हैं ।
लड़की रूप में जन्म लेना ही अभिशाप है, पर लड़कियों के बिना कहाँ ये संसार है ।
लड़कियों के बिना कहाँ ये संसार है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

ठूंठ पेड़

रामजतन राय एक संभ्रांत परिवार के मुखिया थे। उनकी सैकड़ों बीघे पुस्तैनी उपजाऊ जमीन और बाग बगीचे थे। घर में चार चार बैलों की जोड़ी थी, खेती बाड़ी में काम करने वाले दस बीस नौकर चाकर थे। उसकी शादी भी एक जमींदार घराने में हुई थी । सुन्दर पत्नी जो सरल स्वभाव की मृदुभाषी महिला थी। दो साल के अंदर ही घर में पुत्र का जन्म हुआ । इसी खुशी में राय साहब ने अपने घर के सामने खुले मैदान में एक आम का पेड़ लगाया ।
समय के साथ राय साहब का बेटा अजय और उनका लगाया आम का पौधा बढ़ रहा था। पाँच साल के बाद अजय स्कूल जाने लगा और आम का पौधा बढ़कर छोटा मोटा पेड़ बन कर फल देने लगा । घर आँगन में खुशियाँ बढ़ने लगी । राय साहब के घर एक और बेटी तथा बेटा का भी जन्म हो गया । अजय कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर सरकारी अफसर बन गया और उसके छोटे भाई बहन भी पढ़ाई पूरी कर ली। तीनों बेटे बेटियों का व्याह कर राय साहब गंगा नहा लिये । घर बार की सारी जिम्मेदारी छोटे बेटे पर डाल कर वो अब दरवाज़े पर आराम कुर्सी पर बैठे बैठे समाज और आस पास के लोगों की भलाई का काम करते हुए समय बिता रहे थे ।
धीरे-धीरे राय साहब के हाथों से धन दौलत का अधिकार बेटे के हाथों चला गया । राय साहब को क्या चाहिये? समय पर बढ़िया भोजन, सेवा और सम्मान, ये सब उन्हें मिल ही रहा था। उधर उनके लगाये आम का पेड़ अब एक विशाल वृक्ष बन गया था। वर्षों से फलता फूलता पेड़ भी अब बूढ़ा हो गया था । उसपर अब कम फल आने लगा था, साथ ही उसकी कई मोटी मोटी डालियाँ सूखने लगी थी, अतः बच्चों ने उसकी कई डालों को काट काट कर ठूंठ कर दिया था। जो कभी हरी भरी पत्तियों से लदी हुई डालियों पर पंछियों की चहचहाट से गुजायवान थी, वह मात्र एक ठूंठ होकर खड़ी थी। बच्चों को घर के आगे खड़े इस ठूंठ पेड़ से घर की शोभा में रूकावट नजर आने लगी और उन्होंने इस मोटे पेड़ को एक दिन लाखों में बेच दिया ।
राय साहब को इसका बहुत दुःख था, पर उन्हें ये खुशी थी कि बच्चों ने उसे ठूंठ समझकर उनका तिरस्कार नहीं किया है, बरन सम्मान के साथ उनकी सेवा टहल करता आ रहा है । राय साहब बहुत ही खुशकिस्मत हैं कि उन्हें उनकी संतान सदा ही आदरपूर्वक सम्मान दे रहे हैं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।