नदिया तेरी यही कहानी
नदी निरंतर बहती रहती बहती रहती।
बहती बहती दूर समुन्दर में जा मिलती।
पर्वत से ये निकली नदिया, बहती जाती ऊँची नीची।
नदिया तेरे दो किनारे, लाखों को तुम देती पानी।
घने घने वन तीर तुम्हारे, शहर शहर है गाँव किनारी।
हरा भरा मैदान तुमहारे, अन्न का भंडार बनाती।
नदिया तेरी यही कहानी, सबको जीवन देता पानी।
कभी न थकती कभी न रूकती, युगों युगों तक चलती रहती।
युगों युगों तक चलती रहती।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
नदिया तेरी यही कहानी
मेहनत का फल
सोच सोच कर सोच कर देखो, सोच सोच कर समझकर बोलो यार।
फटे कोट और फटी पैन्ट है, चप्पल पैर पुरानी शाल।
ये गरीब इनसान वही है, कल तक जिसका था ये राज।
ऐशोआराम से रहता था वो, खूब लुटाया धन व्यपार ।
बिकी मिल्कियत बाप दादे की, राह पड़ा है वह लाचार।
सूटबूट में खड़ा ये बाबू, दीखता कितना है खुशहाल।
कलतक बाबू इसी हवेली, में था एक अदना रखवाल।
रखवाली करने वाला ये, पढ़ता युवक था दिन रात।
करी पढ़ाई मेहनत से ये, और बना है तहसीलदार।
मेहनत करने वाला इनसा, नहीं कभी होता लाचार।
मेहनत सबका सच्चा साथी, मेहनत करना सीखो यार।
मेहनत करना सीखो यार।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
बिटिया है वरदान हरी की
बिटिया रानी बिटिया रानी,
घर की रौनक बिटिया रानी।
नटखटपन से भरी हुई है,
सबकी प्यारी बिटिया रानी।
गिरती पड़ती दौड़ लगाती,
सबके मन को वो हर्षाती।
पैरों की पायलिया बजती,
रूनझून प्यारी गीत सुनाती।
ठुमक ठुमक के चलती घर में,
घर की रौनक है बढ़ जाती।
पापा जब आते हैं घर को,
उससे लिपटे बिटिया प्यारी।
दादी की गोदी में बैठी,
लगती है परियों की रानी।
घर की शोभा बिटिया प्यारी,
सब जाये उसपर बलिहारी।
हर्षित वह परिवार है भैया,
जिस घर खेले बिटिया प्यारी।
कहे सुरेश सब संत जनों से,
बिटिया है वरदान हरी की।
बिटिया है वरदान हरी की।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
15 अगस्त आजादी दिवस
15 अगस्त सन सैंतालीस, एक बजे की रात घनी।
लाल किले की प्राचीर से, उतरा झंडा ब्रिटिश राज की।
उसी प्राचीर से भारत देश का, लहराया था यही तिरंगा।
आजादी पायी थी हमने, देश प्रदेश गूँजा था नारा।
बड़े शान से लहराता है, उसी दिवस से यही तिरंगा।
आजादी पाने की खातिर, हमने कितने कष्ट सहे।
खेले थे हम खून की होली, लाखों वीर शहीद हुए ।
सीनो पर झेले थे गोली, लाखों फांसी पर लटके ।
सूनी हो गयी कितनी मांगे, लाखों घर वीरान हुए ।
काला पानी काल कोठरी, वीरों ने दी थी कुर्बानी।
यातना भोगी नारकीय वो, इसके बाद मिली आजादी।
वर्षों के संघर्ष बाद ही, हमको मिल पायी आजादी।
हमें पढ़ाया गया अभी तक, चरखे से आयी आजादी।
भूला दिये वो भगतसिंह को, भूले चन्द शेखर आजाद ।
याद हमें सिर्फ यही दिलाया, नेहरु गाँधी का परिवार।
जलिया वाला वाग भूलाये, भूले वीर सुभाष को।
मुगलों का इतिहास पढ़ाकर, हमको झूठा ग्यान दिये।
पढाया नहीं वीर प्रताप को, झांसी रानी को मिटा दिये।
पृथ्वीराज छत्रसाल शिवा को, हम सबसे वो छिपा गये।
शान से लहराता ये झंडा, हमको याद सब दिला गया।
मस्तक ऊँचा रहे हमारा, कहता यही तिरंगा प्यारा।
हम सबको यह याद दिलाता, आजादी का सच्चा नारा।
देश भक्ति है वतन परस्ती, वतन के खातिर जीना मरना।जीवन से भी वतन बड़ा है, वतन के खातिर जीना मरना।
वतन के खातिर जीना मरना।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
आज की देवदासी
कजरारी ऑंखों में मस्तीहै, उन्नत उरोज मखमली गाल।
नागिन सी बलखाती जुल्फे, जुल्म ढाहती दिन व रात।
ओठ गुलाबी मुस्काती जब, दीखते मोती जैसे दांत।
पतली कमर जब बलखाती है, हिरणी जैसी उसकी चाल।
पाओं की पायली कहती, आमंत्रण तुमको है आज।
ऐ सी कमरा सजा हुआ है, पलंग बिछी शीशम वाली।
चादर तकिया लगी हुई है, गद्दा मखमली रेशम वाली।
सुन्दर सोफा लगा हुआ है, सेन्टर टेबल भी लगी हुई।
जाम भरी बोतल है उसपर, काजू रक्खी भूनी हुई।
गुलाब केवरे की ये खुशबू, कमरे में है फैल रही।
रात चाँदनी है ये प्रियतम, शबनम तुम्हें पुकार रही।
इनदरासन सा भव्य भवन में, गीत संगीत सुना दूँगी।
जाम पिलाकर नाच दिखाकर, प्रियतम तुम्हें लुभा दूँगी।
पहनाकर बाहों का हार तुम्हें, ये सूनी सेज सजा दूँगी।
मैं सूनी सेज सजा दूँगी।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
एक फूल खिले हैं अंगना में
एक फूल खिले हैं बगिया में, और दूजा मेरे अंगना में।
एक फूल खिले हैं अंगना में।
बगिया का फूल है बगिया में, अंगना का फूल है गोदिया में।
एक फूल खिले मेरे अंगना में। खूशबू प्यारी इन फूलों की, महके वो मेरे अंगना में।
एक फूल खिले हैं अंगना में। हर्षित दादी गाये लोरी,
जब खेलत है वो पलना में। एक फूल खिले मेरे अंगना में।
बाल कन्हाई लागे जब वो, खेले मैया की बाहों में ।
हर्षित मैया गाये लोरी, जब अमृत पान कराबे गोदी में।
हर्षित बाप और दादा घर में, सुख की वर्षा बरसे घर में।
ईश्वर से कहे कर जोर सुरेश, वन्दन है मेरा वन्दन है।
सबकुछ तेरा ही तेरा है, मैं चारण तेरे चरणों में ।
मैं चारण तेरे चरणों में।
एक फूल खिले हैं बगिया में, और दूजा मेरे अंगना में।
एक फूल खिले हैं अंगना में। एक फूल खिले हैं अंगना में।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
मोदी नाम है राधा श्याम
मोदी को मोदी रहने दें, दिल में बसते हैं ये नाम।
कोई इन्हें भाई कहते है, कोई समझे पिता समान।
माई का बेटा है मोदी, बहना का वह भाई है।
छोटे बच्चों का दादा है, नौजवानों का भाग्य विधाता है।
दुनियाभर का सम्मानित नेता, सबका साथ निभाता है।
वह मोदी है भाई मोदी है, हमें मोदी नाम ही भाता है।
नाम अगर देना ही चाहें, दे दें उनको प्यारा नाम।
भारत का सच्चा सपूत वह, सबके दिल का राधा श्याम।
युगों युगों तक नाम रहेगा, इतिहास में अमर वो नाम।
भैया मोदी याद युगों तक, अमर रहेगा इनका नाम।
जय जय मोदी घर घर मोदी, सदा ही गूंजेगा ये नाम।
सदा ही गूंजेगा मोदी नाम।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
गुरू पूर्णिमा गुरूवर पर्व
पूजनीय हैं गुरू हमारे, जिसने हमको ग्यान दिया।
प्रथम गुरू माताजी अपनी, दूजा गुरू महान पिता।
शिक्षा दीक्षा देने वाले, गुरू हमारे दाता हैं।
अक्षर ग्यान कराने वाले, गुरू हमारे ग्याता हैं।
गुरूजन हैं महान हमारे, उनकी महिमा बड़ी-बड़ी।
प्यार दुलार सख्ती से हमको, ग्यान दिये हैं खरी खरी।
कोरे कागज पर वो लिखते, लेखनी सुन्दर गढ़ी गढ़ी।
नत मस्तक उनके चरणों में, बना दिये पत्थर को पानी।
ग्यान हमें देकर गुरूवर, तूने हमें बनाया ग्यानी।
हम अग्यानी बालक तेरे, सदा रहेंगे आभारी।
सौ बार नमन गुरूवर तुमको, तेरी ये महिमा बड़ी बड़ी।
इस गुरू पर्व के अवसर पर, विनती है तुमसे हे गुरूवर।
करूणा हम पर तेरी बना रहे, रहे हाथ सदा मेरे सिर पर,
हम हैं अग्यानी बालक तेरे, आशीष हमें देना गुरूवर।
हम दया भाव के भूखे हैं, चरणों में शरण देना गुरूवर।
है नमन सुरेश का सभी गुरूओं से, हे मातु पिता हे सब गुरूवर।
हे मातु पिता हे सब गुरूवर।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
गोदना गोदाई
गोदनमा गोदव यही ठैया, रे गोदनमा गोदव यही ठैया।
अगल गोदव बगल गोदव, गोदव बीच ठैया।
रे गोदनमा गोदव यही ठैया।
आजू गोदव बाजू गोदव, गोदव दोनों बहिया।
रे गोदनमा गोदव यही ठैया।
ननदी गोदव भाभी गोदव, गोदव सब बहनिया।
रे गोदनमा गोदव यही ठैया।
बड़की गोदव छोटकी गोदव, गोदव छोटी मुनिया।
रे गोदनमा गोदव यही ठैया।
हीरा मोती सोना लेयब, लेयब हम रूपैया।
रे गोदनमा गोदव यही ठैया।
रे गोदनमा गोदव यही ठैया।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
सच तो सदा ही सच होता है
सच तो सदा सच ही होता है
अंत का भी अंत होता है, अंत भी कहाँ अनंत होता है।
हम जो कहने लगते हैं, वो भी कहाँ अंत होता है।
कहने के बीच में ही, कोई कुछ बोल पड़ता है।
घर हो या बाहर, सभी जगह बात का बतरंग होता है।
न आज अंत है न कल अंत होगा, जहाँ तो अनंत होता है।
आज जो सच है, कल वो झूठ हो सकता है।
सच और झूठ का, कहाँ अंत होता है।
सौ झूठ पर एक सच भारी होता है, सच तो सदा ही सच होता है।
सच तो सदा ही सच होता है।
जयहिंद जयभारत वन्देमातरम
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