Monthly Archives: October 2019

राधा की विनती अपने श्याम से

आरजू सुनो हमारे श्याम ।

राधे राधे जो कहे ,

दु:ख हरियो हे श्याम।

दुःख हरियो हे श्याम।

उनको शरण में रखियो श्याम।

नाम तुम्हारे साथ में ,

राधे श्याम सदा सुख नाम ।

राधे राधे जो कहे,

तरे धरा से श्याम।

सदा तुम्हारे साथ में,

राधा रहे हे श्याम।

राधा रहे हे श्याम।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

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दोस्त की पहचान

दोस्त की पहचान

रात सुबह का इन्तज़ार नहीं करती ।
खूसबू मौसम का इन्तज़ार नहीं करती ।
दोस्त दोस्तों के बुलाने का इन्तज़ार नहीं करता।
दुःख में दोस्त खुद चलकर आते हैं ।
खुशियों में तो बिन बुलाये मेहमान भी आते हैं ।
दोस्त तो दोस्त का चेहरा देख के जान जाता है ।
देखते ही उसके गम को पहचान जाता है ।
एक सच्चा दोस्त लाखों चिपकू से बेहतर होते हैं ।
उसे सिर्फ़ अपने दोस्त की परवाह होती है ।
दुनिया चाहे कितना भी परेशान करे।
वह तो दोस्ती के लिये जान भी देता है ।
वह तो दोस्ती के लिये जान भी देता है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

अंधेरों को दूर करने वाली

अंधेरों को दूर करने वाली

जिसे तलाश कर दिया था हमें अपनों ने।

वह अंधेरों का साथी, है अपना जीवनसाथी ।

घर के अंधेरों को दूर किया जिसने ।

जीवन में लायी बहारे और खुशियाँ ।

अंधेरों को दूर किया जिसने जीवन में ।

वही तो है अपना सच्चा जीवनसाथी ।

अंधेरों में सदा साथ साथ चलने वाली ।

अंधेरों को दूर कर उजाला लाने वाली ।

वही तो है हमारी इस घर की रोशनी ।

अंधेरों को दूर करने वाली ।

हमारी बच्चों की अम्मा, हमारी घर वाली ।

हमारी घरवाली हमारी घर वाली ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

शत-शत नमन है तुम्हें हमारा

हे लौहपुरुष सरदार देश का।

शत-शत नमन है तुम्हें देश का ।

तूने जोड़ दिया टुकड़ों को ,

तूने किया अखंड देश को।

सचमुच ही तुम लौहपुरुष हो,

भारत माँ के सच्चे सपूत हो।

तुम पर गर्वित देश हमारा,

भारत के तुम भाग्य विधाता ।

शत-शत नमन है तुम्हें हमारा ।

शत-शत नमन है तुम्हें हमारा ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

मायका की यादें

यह अजीब दुनिया है, लड़कियाँ जीवन भर अपने मायके की याद नहीं भुला पाती हैं । उसे वो घर आँगन, गली मुहल्ले, स्कूल, संगी साथी सहेलियां और उनके संग बिताये समय बरबस याद आती ही रहती है । जाहिर है जहाँ बचपन बीता हो, घुटने घुटने चली हो, पैरों पर पहली बार खड़ी हुई हो, दादा दादी की उँगली पकड़ कर चलना सीखी हो, पिता की बाहों में झूला झुली हो, माँ की गोद में सर रखकर घंटों उनसे अनगिनत प्रश्नों की झड़ी लगायी हो। वह घर वो कैसे भूल सकती है?

पर कभी आपने उन लड़कियों के बारे में सोचा है, जिनके पिता फौज में हो और हर तीसरे चौथे साल उनका तबादला होता रहा हो। उसका जन्म कहां हुआ, किस घर में उसकी किलकारी गूजी, कहाँ वह चलना सीखी, किन किन जगहों पर पढ़ाई की, और किस घर से शादी हुई ।क्या ये सब याद भी है उसे? फिर भी उसे अपने मायके की याद आती ही रहती है । माता-पिता भाई बहन को तो वह भूल नहीं सकती हैं । कम से कम जबतक माता-पिता जीवित हैं तब तक उनका मायका आना जाना बरकरार रहता है और माता-पिता भी पूरी कोशिश रहती है कि बेटी को अपने से जोड़े रखते हैं ।

सभी बेटियों को समर्पित ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

माँ बाप का योगदान

तिल तिल कर जलते हैं माँ बाप,
धूप में पसीना बहाते हैं माँ बाप ।
सर्दी गर्मी की परवाह किये बिना,
दिन रात मेहनत करते हैं माँ बाप ।
खुद फटे पुराने कपड़े पहनते हैं ,
बच्चों को नये कपड़े देते हैं माँ बाप।
खुद भूखा क्यों न रह जाये,
भरपेट बच्चों को खिलाते हैं माँ बाप ।
बच्चों को बढ़ाने और पढ़ाने में,
खुद क्यों न बिक जाये माँ बाप ।
पर कभी उफ तक न करते हैं माँ बाप ।
तभी तो बच्चे पाते हैं वो मुकाम,
जिसकी तमन्ना किये थे माँ बाप ।
पर जब वही बच्चे पूछते हैं उनसे ,
क्या किये हैं हमारे लिये आप?
हमने तो अपनेे मेहनत और लगन से,
यहाँ तक पहुँचे हैं अपने आप ।
दिल टूट जाती है, छाती फट जाती है ।
बच्चों द्वारा जब किया जाता है अपमान ।
माता-पिता के योगदान का,

आप ऐसे न करें अपमान ।
उनके द्वारा किये बलिदान की,
कभी न उतार पायेंगे उनका अहसान ।
माँ बाप तो जीते जागते हैं भगवान ।
पूजा न सही पर उनका करें सम्मान ।
पर उनका करें सम्मान ।
पर उनका करें सम्मान ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

लड़की पहाड़ों की

पहाड़ों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा, देखा, सुना और समझा है, पर वहाँ की लड़कियों की सही तस्वीर हमें तभी मिल सकी जब मेरी खुद की शादी एक पहाड़न से हुई। चहकती फुदकती पहाड़ों में हर दिन मीलों सफ़र करती वो लड़कियाँ, वो भी उबर खाबर संकीर्ण पगडंडियो पर, कभी ऊंचाई चढ़ते हुए तो कभी ढलान पर उतरते हुए। गरमी सरदी हो या बरसात । गाँवों तक सड़कों का न होना, स्कूल, दवाखाना, शिक्षित डाक्टर का अभाव , पीने का पानी दूर दूर के चश्मे से लाना, ढोर डंगरो का चारा इकट्ठा करना, उसे खिलाना, दूध निकालना, बिजली के अभाव में केरोसन तेल के लालटेन या ढिबरी से रोशनी करना, तीनों वक्त की रसोई तैयार करना और सिर पर बल भी नहीं पड़ने देना। यही तो पहाड़ी लड़कियों की जिंदगी है। और सबसे मुश्किल घड़ी प्रसव पीड़ा में डाक्टरी सेवा न मिलने के कारण बहुतों की मौत हो जाना। वहाँ की आबो-हवा अभी भी विशुद्ध है, खाने पीने के लिये घर बारी से ताज़ी ताजी आर्गेनिक साक सब्जियां भरपूर मिल जाती है, दूध दही की भरमार है, मौसमी फल भरपूर निहायत कम दामों में मिल जाती है । पर लोगों का पहाडों से मैदानी इलाकों के शहरों में पलायन बढ़ता ही जा रहा है। कारण उपरोक्त जन सुविधाओं का अभाव।

ऐसे ही मार्मिक कहानी है वहाँ की एक लड़की वंशी की । बारह क्लास की पढ़ाई पूरी कर वह अपने मामा शर्मा जी के पास छुट्टियाँ बिताने बरेली आयी थी। जहाँ उसके मामा ऐयर फ़ोर्स में सर्जेन्टके पद पर काम कर रहे थे और पत्नी तथा तीन बच्चों के साथ सर्विस क्वार्टर में रह रहे थे ।शर्मा जी सेक्सन इंचार्ज थे जिनके नीचे पन्द्रह लोग काम करते थे। मैं भी उन्हीं के साथ था। हमारी शिक्षा कार्यकुशलता आचार विचार से वे बहुत प्रभावित थे और अक्सर रविवार के दिन मुझे दोपहर के खाने पर अपने घर बुलाया करते थे । मुझे भी मैडम के हाथों का बना घर का खाना अच्छा लगता था और मैं हर रविवार को उनके घर दस बजे तक पहुंच जाता था । बच्चे हम हिलमिल गये थे और हम सभी वहीं मैदान में बैडमिंटन खेला करते, स्कूल की बातें करते, और जब थक जाते तो घर आकर फ़्रेश होकर गरमा गरम ताजी ताज़ी सब्जियों के साथ खाना खाते, शर्मा जी और मैं सर्विस की कुछ बातें करता और दोपहर बाद मैं वापस अपने आवास पर लौट जाता था। इस बार जब मैं उनके आवास पर गया तो एक अजनबी खूबसूरत लड़की को शर्मा जी के बच्चों के साथ घुल-मिल कर खेलते देखा और देखते रह गया। मुझे देखते ही बच्चे चिल्लाने लगे और उसे बोले, दीदी ये ही अंशुल भैया हैं, मम्मी आप को बोल गयी थी न कि जब हमारे लौटने से पहले अंशुल आ जाय तो पकोड़े तलकर चाय के साथ उन्हें खिलाना। वह मुझे अजीब निगाहों से घूरती हुई, मन ही मन बुदबुदाती हुई रसोई घर चली गयी ।

मैं बच्चों के साथ मटर गश्ती करने लगा । आधे घंटे भी नहीं बीते होगे कि वो गरमा गरम प्याज और बैगन की पकौड़िया पूरे प्लेट भर कर ले आयी और साथ में मसाले वाली चाय। बच्चे तो पकौड़ियो पर टूट पड़े और मुझे भी खाने के बोलने लगे। मैं उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए उन्हें भी साथ साथ खाने की आग्रह की। एक हल्की सी मुस्कान के साथ वह भी हमलोगों के साथ धीरे-धीरे निगाह नीची करके खाती रही । अभी हम लोग पकौड़िया खा ही रहे थे कि शर्मा जी पत्नी के साथ बाजार से लौट आये और हम लोगों को साथ साथ खाते देखकर मुस्कुराते हुए वंशी से बोले, वाह वंशी कितनी खुशबूदार लजीज़ पकोड़े बनायी हो। जीजी भी ऐसे ही लजीज़ पकौड़े बना कर हमें खिलाया करती थी। लगता है उसने तुम्हें भी माहिर बना दिया है। वंशी उठकर मामा मामी के लिये चाय बनाने रसोई घर चली गयी और सपत्निक शर्मा जी हाथ मुँह धोकर टेबूल पर आ साथ साथ पकौड़िया खाने लगे। चाय पीने के बाद मैंने शर्मा जी कहा, सर मेरी माँ भी अच्छी रसोई बनाती है, पर उनके बनाये पकौड़े भी इतना स्वादिष्ट नहीं होता, बाजार में भी कहीं ऐसे बेहतरीन पकौड़े कहाँ मिलते हैं । लगता है आपकी भांजी के हाथों में कोई जादू है, तभी तो इतना खाने पर भी मन नहीं भरा । शर्मा जी मेरे चेहरे पर शायद कुछ ढूंढ रहे थे, मुस्कुराते हुए बोले, अंशुल अगर पूरी जिन्दगी ऐसे ही स्वादिष्ट भोजन चाहते हो तो सोच लो। ये बात सुनते ही वंशी रसोई घर भाग गयी। मैं भी सकपका गया, और थोड़ी सोच कर उठा और शर्मा जी और मैडम शर्मा को चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और बोला, वंशी जिस घर में जायगी उसे स्वर्ग बना देगी, पर क्या मैं इस काबिल हूँ कि उसे जीवन भर खुशियाँ दे पाऊगा, अगर आप को भरोसा है तो आप मेरे घरवालों से बात करें, वे मना नहीं कर पायेंगे। मैडम शर्मा उठकर रसोई घर चली गयी और वंशी को बाहों में भरकर बोली, मैं तो यहाँ तुम्हें छुट्टियाँ बिताने बुलायी थी, इसका अंदेशा तो कभी था ही नहीं। हम पहाडों की बेटियां पहाड़ों में ब्याही जाती रही हैं । मैदानों में ब्याहने वाली पूरे इलाके में तू पहली लड़की होगी, पर क्या तेरी अम्मा बाबा , चाचा, ताया इस रिश्ते पर साथ देगें? तेरे मामा ने तो कभी ऐसी बात न कही थी, यह सच है कि अंशुल बहुत अच्छा इनसान, ईमानदार, कर्मठ, तुम्हारे उमर के योग का है ,वह तुम्हें बहुत प्यार करेगा और खुश रक्खेगा। पर क्या गाँव समाज वाले अर्चन न डालेगे? न जाति, न गोत्र, न जनम कुन्डली का मिलान और शादी पक्की। वंशी अपनी मामी जी से बोली मामी, मामा जी हमारा रिश्ता जहाँ भी तय करेंगे, हमारी अम्मा और बाबा उसे खुशी खुशी स्वीकार कर लेंगे । हम तो मामी वो गायें हैं जिसे जिस खूँटे से बाँध दी जाती है , जीवन भर उसी से बंध कर रह जाती हैं । शायद मेरे भाग्य में मैदानों का ही सुख लिखा हो। और सचमुच ही बरेली ऐयर फोर्स स्टेशन में ही हमारी शादी धूम धाम से हो गयी । और वहीं से हमारी गृहस्थ जीवन की शुरूआत हो गयी ।