Monthly Archives: March 2021

यहीं जमीन पर ही जन्नत है

आसमां पर जन्नत है, ये हमारी कल्पना है ।

जमी पर ही जन्नत है, यही बस हकीकत है ।

माँ बाप के साये में खुशियों का खजाना है ।

नदी नालों व झरनों में, यहाँ मधुर संगीत है।

खेत खलिहान बाग बगीचों में, कोयल की गान है ।

मंदिर की घंटियों व मस्जिद के अजानो में ये पैगाम है ।

यहीं जमीन पर जन्नत है , यहीं खुदा व भगवान है ।

यहीं घर घर में बच्चों की किलकारी और मुस्कान है ।

यहीं तो वो परियों की शहजादी और हूरों का वास है ।

इसी जमीन पर ही जन्नत है, बस यही हकीकत है ।

इसी जमीन पर ही जन्नत है, बस यही हकीकत है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

खुशी मनाये होली में

बूढ़े भी बन गये हैं बच्चे, कुछ तो दम है होली में ।
ऑख दिखाती थी वो लड़की, तितली बन गयी होली में ।
गली मुहल्ले वाले लड़के, झूम रहे हैं होली में ।
फौजी भी छुट्टी पर आया, प्यार जताने होली में ।
जीजा जी ससुराली आये, फाग मनाने होली में ।
साला साली खूब उड़ाये, रंग गुलाल इस होली में ।
मलपूआ व गुजिया खाये , भंग घोटाले होली में ।
ननदी देवरा पीछे पड़े गये, भाभी को रंगियाने में ।
कहे सुरेश बुरा मत मानो, भाभी के गरियाने में ।
बुरा बुराई छोड़ दे भैया, खुशी मना ले होली में ।
बस खुशी मना ले होली में, बस खुशी मना ले होली में ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

इनसान सब एक है

इनसान इनसान को पहचानता नहीं है ,
खून खून में भेद नहीं, वो ये जानता नहीं है ।
मजहब के नाम पर कत्ले-आम कर रहा है,
कहीं महाभारत तो कहीं कर्बला बन रहा है ।
न मंदिर में भगवान न मस्जिद में खुदा है,
वो तो हर इनसान के दिल में बस रहा है ।
हवा भी एक है, और पानी भी एक है,
सूरज भी एक है और चंदा भी एक है।
घर घर में नमक और रोटी भी एक है,
तो फिर इनसान इनसान में क्या फरक है ।
न तुझमे फरक है न मुझमे कोई दोष है ।
तो मक्का मदीना व शिवालय क्यों अलग है ।
आदम और ईव के ही संतान हैं सभी,
फिर हम एक नहीं क्यों हम अनेक हैं ।
पर्दा हटाये ये झूठ और फरेब का,
पंडित और मौलवी साथ साथ बैठकर ।
हम इनसान हैं इनसानो की तरह ही रहें,
ये जंगल नहीं है न हम हैं जंगली जानवर ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

अजब का देश गजब का राजा

अजब का देश गजब का राजा , टके सेर भाजी टके सेर खाजा ।
भोली जनता ढोगी नेता, टोपी पहन कर देश को लूटा ।
साठ बरस में बूढ़े होते , यहाँ सभी इंजीनियर डाक्टर ।
सीविल आफिसर न्यायाधीश , वैज्ञानिक शिक्षक प्रोफेसर ।
नेता कभी न बूढ़े होते, पाँव लटकते कब्र में जबतक ।
आँखों पर पट्टी हो जिसके, न्याय की देवी वो कहलाये ।
कहाँ न्याय मिलता गरीबों को, न्याय कभी न उसे मिल पाये।
संविधान भी जिस देश का, अमीर गरीब में फर्क बनाये ।
चोर डाकू व्यभिचारी नेता, ये सब मिलकर राज चलाये।
जनता है लाचार यहाँ पर, अपना दुखड़ा किसे सुनाये।
अपना दुखड़ा किसे सुनाये ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

माता-पिता का दुख

जब बच्चे पढ़ने होस्टल जाते हैं, तो माता-पिता सपने संजोते हैं ।

जब नौकरी करने दूर देश या परदेश जाते हैं , तो वो फुले नहीं समाते हैं ।

जब उनकी शादी कर देते हैं तो वो दादी दादा बनने के सपने देखने लगते हैं ।

जब बच्चे बहू को लेकर परदेश जाने लगते हैं तो वो मायूस होने लगते हैं ।

जब बच्चे परिवार से दूर रहकर अपने बच्चों के साथ खुशी मनाते हैं, तो वो उनसे पुनः जुड़ने की कोशिश करते हैं ।

फिर हर रोज वीडियो पर बच्चों के साथ बातें होती हैं, तो वो पुनः खिल उठते हैं ।

फिर बातें कम होने लगती है, तो वो असहाय महसूस करते हैं ।

जब बच्चे माता-पिता के कौल करने पर धीरे-धीरे उठाना कम कर देते हैं, तो वो टूटने लगते हैं ।

उम्र बढ़ने के कारण बाहरी काम करने में परेशानी होती है, तब उन्हें बच्चों की बहुत याद आती है ।

जब बच्चे कौल करने पर कौल नहीं उठाते और मैसेज लिखते हैं कि आप ने कौल किया था, और कालबैक नहीं करते हैं, तो वो उन्हें मायूशी होती है और वो अंदर से टूट जाते हैं ।

फिर भी लाचार और असहाय माता-पिता अपने बच्चों को सदा खुश रहने की ही दुआ देते हैं ।

आज के भौतिक वादी समाज में ज्यादा पढ़े लिखे और शिक्षित परिवारों की यही कहानी है ।कितने ही माता-पिता को उनके अंतिम समय में बच्चे पानी पिलाने के लिये भी पास नहीं होते हैं ।

अतः सभी बुजुर्ग माता-पिता से हमारा ये संदेश है कि आप निराशा की भावना को भूला कर अपने जीवन को पड़ोसी और उनके बच्चों के साथ व अपने समकक्ष बुजुर्गों के साथ हँसी खुशी से जीने की भरपूर कोशिश करें । समय की यही माँग है।

जैसे चिडिया पंख होते ही घोसले को छोड़कर अनंत आकाश में उड़ जाते हैं और फिर कभी भी अपने पुराने घोसले में नहीं लौटते, वही हाल आज मानव जाति की भी हो गयी है ।

उन सभी बुजुर्ग माता-पिता को समर्पित, जो अपने अंतिम समय में बच्चों से दूर रह रहे हैं ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

बहू

बहू नहीं वह सच में मेरी बेटी है।

घर आँगन की शोभा है वह , सबके मन को भाती है ।

बेटी जैसी चंचल है वह, बहू की जैसी कोमल है।

नहीं रूठती नहीं मचलती, मीठी बोल वह बोलती है ।

सेवा भाव से भरी हुई है, रिश्तों को पहचानती है।

सासू माँ वह मुझे समझती, मम्मी मम्मी कहती है।

अपनी जाई बेटी हमने, बिदा किया है खुशी खुशी ।

परजायी बेटी को हमने, घर लायी हूँ खुशी खुशी ।

बेटे की अम्मा है वह अब, मैं हूँ घर की दादी माँ ।

बहू हमारी बहुत ही प्यारी, बहू नहीं वह बेटी है ।

बहू नहीं वह बेटी है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

भगवान जगन्नाथ भजन

जगरनथिया प्रेमी हो भाय, बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

अरे बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

कथी ले जे पक्की सड़किया, कथी ले नारियल तेल ।

कथी ले जे तार खिचलके , कैहने बनेलके रेल जगरनाथ।

जगरनथिया प्रेमी हो भाय, बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

अरे बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

पाँव चले के पक्की सड़किया, लगवे ले नारियल तेल ।

खबर सुन लय तार खिचलके, देश घूमे लय रेल जगरनाथ ।

जगरनथिया प्रेमी हो भाय, बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

अरे बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

कोने तोरो जिला बोले छे , कोने तोर हो ग्राम ।

कौन कुल के बासी बानी, किये तोर हो नाम जगरनथ।

जगरनथिया प्रेमी हो भाय, बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

अरे बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

मुंगेर मोरा जिला बोले छे, पाटम मोर हो ग्राम।

बरई कुल के बालक हमहूं, सुरेश मोर हो नाम जगरनथ।

जगरनथिया प्रेमी हो भाय, बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

अरे बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

अरे बाबा न हो बिराजे ओरिया देश में ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

मेरी लाडली बेटी

चौदह मार्च अठ्ठहतर को, इस घर में खुशियाँ आयी थी ।

एक नहीं दो बहने संग में, खुशियाँ लेकर आयी थी।

किलकारी गूँजी थी घर में, तुम दोनों की अंगना में ।

गौरव पाया था हमने भी, पिता बनने की जीवन में ।

माँ की गोद भरी थी उस दिन, तुम दोनों के आने में ।

माता-पिता बने हम दोनों, विधि की रीत निभाने में ।

दो से हम तब चार हो गये, तुम दोनों के आने में ।

जीवन कितना सुखमय था तब, तुमको गोद खेलाने में ।

माँ को तुमने खूब सताया, साथ साथ ही रोने में ।

एक साथ ही सोती थी तुम, साथ साथ ही जगती थी।

साथ साथ ही दू दू पीती, साथ साथ ही खाती थी ।

कितना मुश्किल होता था तब, तुम दोनों को पालने में।

न आया थी न थी दादी, एक अकेली अम्मा थी।

पापा तो आफिस को जाते, उन्हें कहाँ जो फुर्सत थी।

बहुत कठिन वह समय हमारा, फिर भी घर में रौनक थी।

तुम दोनों बहनों ने घर को, सचमुच स्वर्ग बनायी थी।

तुम सचमुच स्वर्ग बनायी थी। तुम सचमुच स्वर्ग बनायी थी।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

समझ आयी तो समय नहीं है

काश उस समय समझ होती,

तो आज हम कुछ और होते ।

माँ बाप की बचपन में सुने होते ,

तो आज दुनियाँ की नहीं सुनते ।

आज भी बच्चे कहाँ सुनते हैं,

जो गलती हमने की थी,

वही वो भी आज कर रहे हैं ।

आज समझ में आयी है,

जब समय ही नहीं रहे हैं ।

हम वो आखिरी पीढ़ी हैं ,

जो पुरानी से नयी को जोड़े हैं ।

ये पुरानी अब जर्जर हो गयी है,

हम दुनियाँ छोड़ने को खड़े हैं ।

समय रहते समझ नहीं थी,

समझ आयी तो समय नहीं है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

घर

कौन सा घर और किसका घर है, नहीं तेरा नहीं मेरा घर।

ये तो घर है मातु-पिता का, यहाँ रहा ससुराल का घर।

ये तो घर है बेटे बहू का, ये भाई भाभी का घर।

ये है महल अटारी कोठी, ये है उन सज्जन का घर।

ये तो घर है शहर का अपना, ये है अपने गाँव का घर।

ये सब घर है पास पड़ोस का, पर नहीं किसीका अपना घर।

ना तेरा ना मेरा घर है, ये अपना नहीं बसेरा घर।

चन्द दिनों का घर ये अपना, चन्द दिनों का अपना घर ।

न हम मालिक हैं इस घर के, नहीं हमारा अपना घर।

चन्द दिनों के लिये है अपना, लिये किराये का ये घर।

सांसे जिस दिन रूक जायेगी, नहीं रहेगा अपना घर।

अपना अपना न कर बाबा, अपना नहीं पराया घर।

जिस अपनों के लिये बनाया, तिनका-तिनका चुनकर घर।

वही आज तिनको के ऊपर, सजा रहा है तेरा घर।

मिट्टी से ये बना शरीरा, जल ये राख हो जायेगा।

अपना अपना करने वाला, अपना यहीं रह जायेगा।

ना ये तेरा ना ये मेरा, ना ये दुनियाँ अपना घर।

सोच समझकर रह ले प्यारे, आपस में सब मिलजुलकर।

आपस में सब मिलजुलकर। आपस में सब मिलजुलकर ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।