Monthly Archives: September 2020

याद दिलाते रहना

दीपक का जलना,
ये रौशनी का होना।
फूलों का खिलना,
ये बागों का महकना।
दिलों का धड़कना,
अपनों का याद आना ।
ये रिश्ता है दिल से,
दिलवालो का कहना ।
कौन आया कहाँ से ,
किसे कहाँ को जाना ।
कौन है पराया यहाँ,
कौन यहाँ है अपना ।
ऊपर से बनकर आया है ,
रिश्ता बहुत पुराना ।
मिलते आपस में वो ऐसे,
बिछड़े नहीं कभी ना।
करोना आकर सिखा गया,
रिश्ता नहीं भुलाना ।
दूर-दूर ही रहना सबसे,
पर याद दिलाते रहना ।
सबको याद दिलाते रहना ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

बेटियाँ

घर आयी जब नन्हीं परी, किलकारी घर में गूँजी।

दादा दादी खिले खिले, घर की रौनक आयी परी।

ठुमक-ठुमक कर चलती वो, बजे पैजनिया उनके वो।

नये नये कपड़ो में वो , मूरत सी हैं लागती वो।

दो चोटी कर स्कूल जाती, रख कंधों पर स्कूल बैग।

हँसती गाती कॉलेज पहुँची, डिग्री लेकर आयी वो।

बाबा की प्यारी गुड़िया वो, शादी करने वाली योग ।

नींद हराम हुई बाबा की, सोच सोचकर तड़पे वो ।

ताम झाम से हो गयी शादी, हुई बिदाई बिटिया की ।

बाबा के घर रोये सारे, खुशी मनाये ससुराली।

सासुमा ने लियें बलाये, घर में लक्ष्मी आने की ।

अपनी बेटी हुई परायी, बनी बहुरिया बेटी घर की ।

बेटी जब जब घर को आती, घर में रौनक लाती वो।

बचपन उसका लौट के आता, मायके में जब आती वो।

माँ बाबा की प्यारी गुड़िया, गुड़िया लेकर आती वो।

जब गुड़िया लेकर आती वो, जब गुड़िया लेकर आती वो ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

गोरैया

बरसों बीत गयी है अब तो, झुण्ड गोरैया के देखे।
गावों में अब भी ये मिलती, शहरों में ये कहीं न दीखे।
सांझ ढले जब आती थी सब, झुण्ड झुण्ड गौरैया की ।
इनकी रोज चहचहाट होती, कानों में मिश्री सी घुलती।
दाना चुगना दौड़ लगाना, फुदक-फुदक कर वो उड़ती ।
गुम हो गयी कब ये चिडियाँ, याद नहीं हमको आती ।
ये याद नहीं हमको आती । ये याद नहीं हमको आती ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

अनछुए प्यार

चाह नहीं सोने चांदी की,

चाह नहीं मखमल रेशम की।

चाह नहीं हमें दूध मलाई,

चाह नहीं लड्डू बरफी की।

चाह नहीं लंहगा साड़ी की,

चाह नहीं पायल कंगन की।

मैं प्यासी साजना की गोरी,

अंग अंग बस सजना तोरी ।

यही प्यार सजना मैं चाहूँ,

घर में बनी रहूँ मैं रानी।

तू साजना मैं सजनी तोरी,

तू साजन मै सजनी तोरी ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

कितना बदल गया इंसान

सूरज नहीं है बदला उगना, न बदला चाँद सितारे ।

बृक्ष न बदला फलना फूलना, न बदली नदियाँ नाले ।

फूल नहीं बदला है खिलना, न वायु का बहना ।

आम न बदला मीठा होना, ईमली का खटरस होना।

डाल डाल पंछी का उड़ना, मछली का पानी पर चलना।

खारा पानी भरा समुदर, मीठा वर्षा जल का होना ।

न बदला ये दिन व रात, न बदले है माँ और बाप।

बदल गया इनसान यहाँ पर, भूले अपने माँ और बाप ।

भूल गयी इनसानीयत उसने, कैसा दिन ये आया आज।

भाई को भाई से नफ़रत, बहन परायी हो गयी आज।

पास पड़ोसी नाते रिश्ते, गुरु नहीं पाते सम्मान ।

ये कैसा आ गया जमाना, बेटा बाप का करे न मान।

बेटा बाप का करे न मान। बेटा बाप का करे न मान ।

भाई भाई का बंटवारा

भाई भाई का प्रेम सुनहरा, हँसता गाता बचपन था।
भाई बढ़कर बड़ा हो गया, छूट गया वो बचपन था।
पढ़ लिखकर सब बड़े हो गये, भूल गया वो बचपन था।
शादी हो गयी पत्नी आयी, घर का चूल्हा बिखर गया ।
घर टुकड़ों में बंटे हमारे, आँगन में दीवार बनी ।
जिस थाली में साथ साथ हम, बैठ कर खाना खाते थे।

वह थाली अब हमें चिढ़ाती ।भागर वाले के हाथों में ।
माँ बाबा को बाँट लिये हैं, साथ नहीं रहते दोनों ।
कैसा पाप किया है हमने, भाई भाई अपनों में ।


जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

बुनियाद

दरवाजे दर असल दिल होते हैं,

उन दीवारों से बने मकानों की।

हमारी बातें बता देती हैं पहचान,

हमारी पारिवारिक पालन पोषन की।

हमारी लफ्ज़ बयां कर देती हैं,

हमारी अन्दरूनी सोच की।

हमारा व्यवहार बता देता है,

हमारी अपनी बुनियाद की।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

नयी पहल

आज बेटियों के लिये एक योग्य, शिक्षित, संस्कारी, खानदानी और गुणवान वर ढूढना जितनी मुश्किल हो गयी है, उससे भी अधिक घर में सुसंस्कारी, पढ़ी लिखी, खानदानी, सुन्दर और सुशील वधु लाना। शेखर बाबू भी ऐसे ही एक सुशील कन्या, अपने होनहार मल्टी नेशनल कारपोरेट मे काम करने वाले बी टेक बेटे अभय के लिये ढूँढ रहे थे। दो साल पहले ही उन्होंने अपनी इन्जीनियर कमाऊ बेटी मोनिका की शादी एक सुसंस्कृत परिवार के मल्टी नेशनल कारपोरेट मे काम करने वाले इंजीनियर से दूसरे शहर में किये थे।

मोनिका अपनी ननद के बेटे की शादी में पिछले महीने उसकी ससुराल गयी थी। वहीं उसने एक सुसंस्कृत परिवार की सुन्दर पढ़ी लिखी कन्या माधवी से मिली। वह भी वहाँ अपने मौसेरे भाई की शादी में अपने परिवार के साथ आयी थी। दोनों हम उम्र थी, अतः एक ही दिन में दोनों की दोस्ती हो गयी। मोनिका माधवी के बारे में अपनी ननद से पूरी जानकारी जुटा ली। माधवी के पिता कर्नल अनिल फौज से अवकाश प्राप्त हैं और उसका भाई मोहित भी फौज में मेजर है। माधवी भी बी टेक के बाद नौकरी कर रही है । उसे वह अपने भाई के लिये उपयुक्त संगनी लगी। उसने अपने माता-पिता को इसकी जानकारी दे दी ।

शेखर बाबू अपने पत्नी और बेटे से विचार विमर्श किये और कन्या को देखने के लिये उसके परिवार से संपर्क कर, निश्चित तिथि को समय से कुछ पहले ही परिवार सहित मिलने पहुँच गये । माधवी के माता-पिता मेहमान की आवभगत के लिये मिठाई खरीदने बाजार गये हुए थे । घर में उस समय माधवी अकेले ही थी। मेहमान के अकस्मात आने पर उसने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठायी और झटपट नींबू का शरवत बना कर उन्हें दिया और पास बैठ गयी । माधवी को असहज देख कर सविता देवी उसे प्यार से बोली । बेटी घबराओ नहीं हम लोग आपसे ही मिलने आये हैं। मोनिका ने हमें तुम्हारे बारे में सारी बातें बता दी है, हमें तो कुछ पूछना नहीं है, पर तुम्हें हम सब कुछ बतायेंगे और उससे आगे तुम जो कुछ भी जानना चाहोगी हम तुम्हें जरूर बतायेंगे।

यह मेरा तीस साल का बेटा अभय है। मल्टी नेशनल कारपोरेट में बी टेक के बाद नौकरी कर रहा है । हमारी बेटी मोनिका से तुम मिल ही चुकी हो। ये अभय के पिता अवकाश प्राप्त स्कूल प्रिन्सिपल हैं और मैं होम मेकर सविता देवी। हमारा अपना घर द्वार है और गृहस्थी की सारी सुख सुविधा से भरपूर है। घर में घरेलू काम करने वाली बाई आती है, पर रसोई मैं खुद बनाती और खिलाती हूँ । हमलोगों को तुम और तुम्हारा परिवार पसंद है। बांकी तुम्हें और जो जानकारी चाहिये, तो अभय को अपना गार्डेन दिखाओ और एक दूसरे को समझ लो। अगर तुम्हारी सहमति होगी, तो हम लोग तुम्हारे माता-पिता से तुम्हारा हाथ मांगगे। माधवी ये सब सुनकर मुस्कुराते हुए सोफे से उठकर अभय के साथ बाहर गार्डेन घूमने चली गयी।

कुछ समय बाद माधवी के माता-पिता बाजार से लौट आये और घर में पहले से ही बैठे मेहमानों को देखकर हैरान हो गये। शेखर बाबू और सविता देवी दोनों उठकर एक दूसरे को हाथजोर कर नमस्ते किये। तभी माधवी अभय के साथ मुस्कुराते हुए ड्राइंग रूम में प्रवेश की और अपने माता-पिता से बोली, पापा आपलोग मेहमानों से बातें करें, तबतक मैं चाय नाश्ते का प्रबंध करती हूँ और वह गुनगुनाते हुए कीचन में चली गयी ।

अनिल कुमार शेखर परिवार से आगे वो सारी जानकारियां ली, जो एक बेटी के बाप के लिये जरूरी होती हैं। जिससे उन्हें तसल्ली हो जाये कि उसकी बेटी अपने होने वाले ससुराल में ताजीवन सुखी और खुशहाल रहेगी । तभी नाश्ते मिठाई और गरमा गरम चाय लेकर माधवी ड्राइंग रूम में आयी। दोनों परिवारों ने एक दूसरे का मुँह मीठा कराये और रिश्तों को आगे बढ़ाने की मोहर लगा दी ।

माधवी और अभय उस दिन से आपस में मोबाइल पर बातें करते और अपने भविष्य के सपने बुनते। दो महीने बाद दोनों का विवाह सीधे सादे किन्तु धूमधाम से बिना दहेज की हो गयी । आस पड़ोस के लोगों के लिए यह शादी एक मिसाल बन गयी । आज वर्षों बीत गये हैं, दोनों परिवार खुशहाली से जीवन जी रहे हैं ।

सच्चाई पर आधारित पर नाम कपोल कल्पित । हमे आशा है कि माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षित और संस्कारित करेंगे और दकियानुशी रति रिवाजों को छोड़कर बिना दान दहेज की शादी कर समाज में औरों के लिये प्रेरणा बनेंगे ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

इसे गुलज़ार रहने दो

बचपन से जवानी तक ,

जवानी से बुढ़ापे तक।

लगोटिया यारों की शरारत,

जवानी की वो हसरत।

बुढ़ापे की ये संगत ,

यार दोस्तों की ये मिल्लत।

इसे गुलो गुलज़ार रहने दो।

भूली बिसरी यादों को,

सदा खुशहाल रहने दो।

बहारे थी बहारे हैं,

इसे गुलज़ार रहने दो।

इसे गुलज़ार रहने दो

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

जिंदगी की किताब

तुम सवाल हो सवाल करते रहो,

जबाब देना न देना मेरा फर्ज है।

जरूरी नहीं हर सवाल का जवाब,

तुम्हें पसंद आये न आये।

जिंदगी की किताब हो तुम,

मैं तो पढ़ते पढ़ते थक गया हूँ ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम