Monthly Archives: May 2018

सास ससुर संग सहयोग

बहुत ही सुन्दर और सटीक लिखा है आपने। हर जगह लक्षण रेखा जरूरी है।
खुद खुश रहें और औरों को भी खुशी से रहने दें।
अगर हर लड़की अपने सास ससुर की देखभाल माता पिता के समान ही करने लग जाये तो उसे अपने खुद के माता-पिता की न कोई चिंता रहेगी और न कोई बृद्धाश्रम ही रहेगा।
वो कैसी अनोखी दुनिया होगी जहाँ हर माँ बाप अपने बेटे बहू और पोते पोतियो के संग संग हँसी खुशी से जिंदगी गुजार सकेगें। न बच्चों को दादा दादी की कमी महसूस होगी और न कामकाजी पति पत्नी को घर में ताला लगाना पड़ेगा और न बच्चों को बालाघर में रखना पड़ेगा।
शायद समय खुद ही बच्चों को सोचने पर मजबूर कर दे।
हमारी शुभकामनाएं आपके साथ है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

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उन्नति के पाँच मूल मंत्र

आप अपने बच्चों में निम्नलिखित पाँच का चीज़ों को देकर उनका जीवन सदा सफल बनायें।

1 शिक्षा — उन्हें अच्छी शिक्षा दें।

2 संस्कार —शिक्षा के साथ साथ अच्छे संस्कार भी दें।

3 संगति— शिक्षा और संस्कार तभी सार्थक होगा जब उनकी संगति अच्छे लोगों के साथ रहेगी।

4 एकता— उपरोक्त चारो के बाद आपसी एकता,परिवार और समाजिक एकता भी बहुत जरूरी है।

5 ब्यक्ति गत पहचान — अपनी ब्यक्तिगत पहचान होना भी जरूरी है यह आपकी उन्नति में सहायक होती है।

शिक्षा

दिया और बाती है साथ साथ ,

पर जल नहीं पाती है।
तेल का मिल जाये साथ,

तो घर रौशन कर देती है।
शिक्षा वो तेल है,

जो अंधेरे को करता है उजाला।
अनपढ़ गँवार कालीदास को भी,

महान बना देता है।
जहाँ न जाए रवि वहाँ जाये कवि,

शिक्षा है मणि।
शिक्षत हो देश, शिक्षत हो समाज,

तभी तो ये बात है बननी।

जयहिंद जयभारत वन्देमातरम।

वक़्त

प्रथम भाग

वक्त नूर को भी बेनूर बना देता है,
वक्त फ़क़ीर को भी हुज़ूर बना देता है,

वक़्त की कद्र कर ऐ- बन्दे,
वक्त कोयले को भी कोहिनूर बना देता हैं।

पत्थर में भगवान है, यह समझाने में धर्म सफल रहा।
पर इंसान में इंसान है, यह समझाने में धर्म असफल रहा ।

गुस्सा करने के बदले रो लेना अच्छा है।
क्योंकि गुस्सा दूसरों को तकलीफ देती है।
जबकि आँसु चुपचाप आत्मा से बहकर
हृदय को स्वच्छ करते हैं।

आपका सम्मान उन शब्दों में नहीं है,
जो आपके सामने कहे गए।
बल्कि उन शब्दों में है, जो आपकी अनुपस्थिति में कहे जाते हैं ।

“प्रेम” या “सम्मान” का भाव , सिर्फ उन्हीं के प्रति रखिएगा।

जो आपके “मन” की भावनाओं को समझते हैं।कहते है — जलो वहाँ, जहाँ जरूरत हो।
“उजालों” में “चिरागों” के मायने नहीं होते।

इंसान को अलार्म नहीं, जिम्मेदारियां जगाती हैं

“सुख हो लेकिन शांति ना हो, तो समझ लीजिये। आप सुविधा को गलती से सुख समझ रहे हैं।

जितना हम अध्ययन करते हैं,
उतना ही हमें अपने अज्ञान का आभास होता जाता है।

आपका दिन मंगलमय हो, जीवन खुशियो से परिपूर्ण हो।

द्वितीय भाग

पेड़ो की तरह जीवन जियें , दूसरों को फल और छाया देते रहें।

कुएँ के जल की तरह शीतल रहें, ताकि आपके पास सभी आयें।

फलदार वृक्ष ही झुकते हैं, सूखे पेड़ काट दिये जाते हैं।

माँ बाप ही अपने को तपाकर , बच्चों को आगे बढ़ाते हैं।

तपते लोहे से ही औज़ार बनते हैं, सोना को तपाने पर ही निखार आता है।

संघर्ष के बिना जीवन अधूरा है, अविरल चलते रहना ही जीवन है।

सरिता कल कल बहती रहती है, प्रति क्षण आगे बढती रहती है।

लाखों प्राणियों की प्यास बुझाती है, ताल तलैया सूख जाते हैं।

धन हो या ग्यान बाँटने से ही बढ़ता है, संचय से घटता ही जाता है।

मान सम्मान के लिये नहीं जीयें , बरन आत्म सम्मान के लिये ही जियें।

खुश रहें और औरों को भी खुशियाँ बांटते रहें।

दो दिन की जिंदगी है, दिल खोलकर जियें।

प्रथम भाग रिसीव्ड औन वाट्सअप,

द्वितीय भाग हमारी अपनी रचना है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

छाँव

यह आज की कितनी बड़ी विडम्बना है कि एक माता-पिता अपने तीन तीन चार चार बच्चों की परवरिश खुशी खुशी कर लेते हैं और उन्हें पढ़ा लिखा कर एक अच्छा इनसान बना देते हैं और इतना सब करते हुए उन्हें कोई परेशानी नहीं होती हैं ।

परन्तु जब वही बच्चे पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो जाते हैं और माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं तो वे उनका समुचित मान सम्मान और भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं। माता-पिता से कहाँ चूक हो जाती है कि उनके अपने ही बच्चे उन्हें उनके अपने ही घरों से बेदखल कर दर दर भटकने को मजबूर कर देते हैं।

समाज शास्त्रियो को इस इस पर गहन चिंतन करनी चाहिए। ताकि हर माता-पिता अपने बुढापे में परिवार के साथ मिलकर सुखमय जीवन बिताते हुए अंतिम समय में खुशी खुशी आँखे बंद कर परमात्मा में लीन हो सकें।

क्यों ये बच्चे उन्हीं पेड़ को अपने ही हाथों काटने को मजबूर होते हैं, जिस पेड़ की छाँव में वे बड़े हुए हैं और उसी का मीठा फल खाकर जवान हुए हैं ।आखिर कुछ तो इसका कारण जरूर होगा। इसका हल जरूर निकाला जाना चाहिए।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

सुख दुःख जीवन के पहिये हैं

सुख दुःख जीवन के पहिये हैं

सुख दुःख जीवन के पहिये हैं, ये सिक्के के दो पहलू हैं।
एक बिना दूजा अधूरा है, दोनों मिलकर ही पूरा है।
दुख में धीरज और सुख में संयम, बना रहे यही रब से दुआ है।
दुख सहने की और सुख बाँटने की, शक्ति देना प्रभु हमें।
हमें आप अपने से कभी दूर न करना, यही विनती है हमारी।
हम हम ही बना रहें प्रभु, कभी बड़े होने की गरूर न होने देना।
आपके चरणों की धूल मेरे माथे लगी रहे , यही उपकार करना।
अपने भक्तों पर सदा दया दृष्टि बनाये रखना।
प्रभु अपने भक्तों पर सदा दया दृष्टि बनाये रखना।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

शादी की चौवालीसवीं साल गिरह

आज शादी के सालगिरह की, मिलकर खुशी मनाते हैं।

चौवालीसवीं साल गिरह है, जमकर खुशी मनाते हैं।

इसी दिवस सन चौहत्तर में, बंधकर इस प्यारे बंधन में।

जीवन भर का साथ निभाने, कसमे खाये थे हमदोनों।

उमर तभी थी सत्ताइस की, आज एक्खत्तर पार हुई।

प्यार हमारा तब जैसा ही, दोनों दिल में भरी हुई।

साल चौवालिस बीत गये हैं, शादी के दिन मिलने के।

मिलजुलकर दुख सुख बांटे हैं, जीवन में हम साथ चले।

दुआ सुरेश करे है रब से, खुशियों की सौगात मिले।

दो से हम अब पाँच हुए हैं, बच्चे अब तो बड़े हुए।

पल पल खुशियाँ घर में आयी, नाती नातिन रौनक़ लायी।

ले अवकाश एयरफोर्स से, पेंशन अब हम पाते हैं।

संगी साथी से हम मिलकर, नितदिन मौज मनाते हैं।

आज इकट्ठे हुए यहाँ सब, देने मिलकर इन्हें बधाई।

खुशियों से भरी जीवन हो इनका, हमें खिलाये खूब मिठाई।

दुआ हमारी है भगवन से, ये मनाये डायमण्ड जुबली।

भरा पूरा संसार हो इनका, बच्चों का हो प्यार इन्हें।

दुख की बदली कभी न छाये, हँसते गाते सदा रहें।

चौवालीसवीं साल गिरह पर, यही दुआ हम करते हैं।

मिलकर सारे साथी गण हम, इन्हें बधाई देते हैं।

चौवालीसवीं साल गिरह पर, इन्हें बधाई देते हैं।

हम इन्हें बधाई देते हैं, हम इन्हें बधाई देते हैं ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

प्रेमिका और पत्नी

प्रेमिका हमारी कल्पना और पत्नी पूर्णता है।

कल्पना गुदगुदाने वाली मन की उमंग है।

पूर्णता जीवन की सही दिशा की डोर है।

प्रेमिका कली है तो पत्नी खिली हुई फूल है।

पत्नी जीवन संगीनी है तो प्रेमिका प्रेम की मूल है।

पत्नी पूर्णता और उमंग को साकार करती है।

कल्पना पूर्णता प्राप्त करने की रूप रेखा बनाती है।

पत्नी भी पहले पहल हमारी कल्पना ही होती है ।

पति को पत्नी में सदा अपनी प्रेमिका ही नजर आती है।

पत्नी चाहे जैसी भी रूप और गुण वाली हो।

पति को वह एक खूबसूरत हीरोइन ही दिखती है।

पति पत्नी का रिश्ता एक अनजाना बंधन है।

जो किसी डोर से बंधे बिना ही बंधा हुआ है।

जनम जनम से बंधकर चला आ रहा है।

जनम जनम से बंधकर चला आ रहा है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।