Monthly Archives: April 2020

जरूरत से ज्यादा

हाँ जरूरत से ज्यादा, आप शहरों में घर घर जाकर देखें और पता करें तो मालूम होगा, हम अपने घरों को कबाड़ख़ाना बना कर रक्खे हुए हैं।

आज हर किसी औसत कमाई वाले के पास कम से कम बीस जोड़े पहनने के कपड़े हैं । अच्छे किस्म के कीमती कपड़े आज दस सालों में भी न फटते हैं न इनका रंग फीका पड़ता है । कारण पहले तो इनका व्यवहार कम होता है, दूसरा अच्छे डिटर्जेंट से धुलाई होती है । फिर इसका टिकाऊ होना लाजिमी है ।

घरेलू व्यवहार के बर्तन घरों में कम से कम तीन तीन सेट मिल जायेंगे । पहली स्टील की , दूसरी काँच की और तीसरी चायना क्ले की। कीचन में अल्युमिनियम, स्टील, डूरालिमिनियम, और नौन स्टीक वाले बर्तनों का ढेर मिलेगा ।

बच्चों के खिलौने की बात तो पूछो मत। बचपन से लेकर दस साल के अलग-अलग ढेरों खिलौने से अलमारी भरी हुई है, इन्हें यादगारी के लिये संभाल कर रक्खें हुए हैं । उसी तरह उनके कपड़े जो कभी पहने गये थे या फिर अलमारी में रक्खे रक्खे छोटे हो गये, तो उसे भी बहुत संभाल के रक्खे हुए हैं क्योंकि उसमें उनकी यादगारी छिपी हुई है । ये जनम के वक़्त पहना था, ये पहली वर्षगाँठ पर, ये दूसरी , तीसरी और फिर ये मामा ने दिया था फिर मौसी और नानी अदि आदि । गिफ्ट्स की तो बात ही न करें । उससे एक दूसरी अलमारी भरी हुई है । बेडसिट तीन तो पलंग या चारपाई है पर कम से कम हर चारपाई पलंग के लिये पाँच पाँच सेट तो रहता ही है । पुराने रंगवीहीन हुए नहीं कि नयी डिजाइन घर आ गयी ।मुश्किल तो तब होती है कि इतने सारे समान दो कमरे के मकान में रक्खें कहाँ? मोह वश न फेक पाते हैं न दान कर पाते हैं । वो कपड़े देकर बर्तन खरीदने वाला समय भी नहीं है और अगर भूले भटके कोई ऐसा आ भी गया तो कौन सा बर्तन ले ? घर में तो ऐसे ही बरतनों का ढेर पड़ा है ।यही हाल जूते चप्पल का है। हर सेट के साथ अलग-अलग जूते चप्पल, घर में पहनने के लिये अलग बाथरूम के लिये अलग । फिर रोना रोते मंहगाई का। समझ नहीं आता है कि हम कहाँ जा रहे हैं ।

भाई मैं शहर में रहने वाले उन सबके बारे में कह रहा हूँ , जो फ्लैटों और बंगलों में रहते हैं । न कि गाँव में अपनी खेती बाड़ी कर गुजर बसर कर रहें हैं और यही देखकर एक खेतिहर मजदूर अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिये दिन रात पसीना बहाते हैं कि एक दिन उसका भी बेटा ऐसी ही खुशहाल जिंदगी जी सकेगा। पढ़ने के बाद वह खेती बाड़ी छोड़ कर शहर में बस जाता है और माँ बाप तरसते तरसते गाँव में ही दम तोड़ देते हैं और हम यहाँ जरूरत से ज्यादा इकट्ठा करते जाते हैं । अपनों को भूलकर उनकी जरूरतों को नजरअंदाज कर ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

ये कभी सोचा भी नहीं था

गर्मियों के इस माहौल में बच्चे तरस जायेंगे,
अपने ही कमलैक्स के स्वीमिंग पूल जाने में ।
शाम में अपने दोस्तों और सहेलियों से बात करने में ।
खाते हैं पीते हैं सोते हैं पर डर डर के जी रहे हैं ।
इसी दिन के लिये कभी इनसान तरसते थे।
छुट्टियाँ भी नहीं मिलती थी घर में रहने की ।
आज घर में बैठे बैठे परेशान हो गये हैं ।
एक दूसरे के सुख दुःख में हम जरूर साथ हैं।
पर डरे और सहमे हुए ही रहते हैं ।
कल क्या होगा यही सोचकर सहम जाते हैं ।
एक मामूली सा कीड़ा जो दीखता भी नहीं ।
सारी दुनिया को दहला कर रख दिया है ।
इनसान अपने को भगवान समझ रहे थे ।
आज इस कीड़े ने उसे उसकी औकात बता दी है ।
फिर भी वह किस गुरूर में आज भी जी रहा है।
जिसे खुद भी अगले पल का पता नहीं है ।
जिसे खुद भी अगले पल का पता नहीं है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

कबूतर कबूतरी का प्यार

आज रात हमारे इलाके में झमाझम बारिश हुई है । सुबह गुनगुनी धूप खिली है । आसमान बिलकुल साफ़ है। बीच बीच में सूरज की बादलों से लुकाछिपी मौसम को हसीन बना दी है ।मैं नास्ता करके बालकनी में बैठ मौसम का आनंद ले रहा था । तभी सामने वाले बालकनी में एक कबूतर का जोड़ा अठखेलियां करते दीखा। उसका आपस में एक दूसरे से लड़ना, एक दूसरे को चोंचो से सहलाना, कभी उड़कर एक दूसरे का पीछा करना बहुत ही सुखदायी था । इसी तरह दोनों खेलते रहे, अकस्मात मादा कबूतरी एक जगह रेलिंग पर लेट गयी और कबूतर अपने चोंच से उसके चोंच और सिर से खेलता रहा । कबूतरी तब तक आराम से लेटी रही जबतक कबूतर उसको प्यार नहीं किया । फिर जैसे ही दोनों का प्यार खतम हुआ वे दोनों दूर आकाश में उड़ गये ।

मैं सोचता रहा कि प्रकृति में पशु पक्षियों में भी कितनी समझदारी है, कि वह मादा की सहमति के बिना उससे प्यार नहीं कर सकते हैं और हम इनसान कितने गिरे हुए हैं, कि आये दिन खुलेआम स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार करने से भी नहीं चूकते हैं ।

ईश्वर से प्रार्थना है कि हम इनसानो को भी सम्मति दे ताकि ये दुनिया सही में रहने लायक हो।

सुरेश मंडल

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

प्रेम अनंत है

प्रेम आनंद की जननी है ।
प्रेम है तो घर संसार है।
प्रेम है तो गरीबी में भी खुशहाली है।
प्रेम हो तो घर में ही स्वर्ग है।
माता-पिता से प्रेम हो तो घर ही मंदिर है ।
पुस्तक से प्रेम हो तो आप ग्यानी हैं ।
देश से प्रेम हो तो आप देश भक्त हैं ।
प्रेम ही पूजा और इबादत है।
प्रेम ही दाम्पत्य जीवन की रीढ़ है ।
प्रेम तो गन्ने के अंदर का रस है।जो दीखता तो नहीं पर चूसने पर मुँह मिठास से भर जाता है ।
प्रेम पीड़ा नहीं प्रेम हर रोगों की दवा है ।
प्रेम करें अपनों से, परायो से, जन जन से , प्रकृति की हर वो चीज़ से , जिसे ईश्वर ने गढ़ा है । उसका संरक्षण करें विनाश नहीं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

माँ है तो ये सारे जहाँ है

खुशी होती है माँ की गोदी में ।

खुशी होती है माँ की लोरी में ।

खुशी होती है माँ की रोटी में ।

खुशी होती है माँ की खुशी में ।

खुशी होती है माँ की दुआ में ।

खुशी होती है माँ के आशीष में।

खुशी होती है माँ के चरणों में।

खुशी होती है माँ की आँचल में।

माँ तो खुशी का समुन्दर है।

माँ है तो खुशी हमारे अंदर है।

माँ है तो हर पल खुशी ही खुशी है।

वह खुशकिस्मत है जिसकी माँ है।

माँ है तो ये सारे जहाँ की खुशियाँ है।

माँ है तो ये सारे जहाँ की खुशियाँ है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

पितृ शोक

मेघाराम एक धनी सेठ था। वह अलवर में ही पिता से मिले व्यवसाय को अपने लगन से खूब बढ़ाया । वह वहीं अपने माता-पिता पत्नी और दो साल के बेटे के साथ सुख पूर्वक रह रहा था । वह अपने माता-पिता से बहुत प्रेम करता था और उनकी सेवा टहल दोनों पति पत्नी मिलकर किया करता था ।

बेटे के दो साल होने पर वे उसके मुनडन के लिये, अपने ही कार से हरिद्वार अपने माता-पिता और परिवार के साथ आया हुआ था । मुनडन संस्कार बहुत ही धूम धाम से मनाया और पंडो को काफी दान दक्षिणा दिया । पंडो ने भी बच्चे को दीर्घायु , स्वास्थ्य और सुखी संपन्न जीवन का आशीर्वाद दिया ।

मुनडन संस्कार के बाद वह पूरे परिवार सहित कार से वापस लौट रहा था । सभी खुश थे और बच्चा अपने माँ दादी के साथ कार में पीछे की सीट पर मस्ती कर रहा था । सभी उसके चंचलता पर उसकी बलैया ले रहे थे । तभी अकस्मात कार के सामने हिरणो की एक टोली सड़क पार करने लगी। मेघाराम हिरणो को बचाने के लिये अकस्मात ब्रेक लगया, पर तब तक कार हिरण के झुण्ड से टकराकर सड़क के नीचे गड्ढों में लुढक गयी । राहगीरों ने बड़ी मुश्किल से उनको कार से बाहर निकाले और उन्हें नजदीकी अस्पताल में दाखिल करवाए । जहाँ दो दिनों तक वे लोग मौत से जूझते रहे और अंत में डाक्टर सिर्फ़ मेघाराम, उसकी पत्नी व बेटे को ही बचा पाये। उनके माता-पिता परमधाम को लौट गये ।

इस घटना से मेघाराम टूट गया पर हितैषियों के समझाने पर कि ये उनके सेवा का ही फल है कि वो अपने माता-पिता के आशीर्वाद से सही सलामत बच गये, अतः उनके लिये शोक न मनाकर उनकी अंतिम क्रियाकर्म का प्रबंध करें ।ईश्वर की यही मर्जी थी। उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें ।

सुरेश मंडल

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

ते रौब है वर्दीधारी का

पैन्ट कमीज पर जूता मौजा, टोपी कलगी धारी का।

मस्त चाल में चाल मिलाकर, चलना वर्दीधारी का।

ये रौब है वर्दीधारी का, ये रौब है वर्दीधारी का।

हाथ में राइफल कमर में बेल्ट, बूट टपाटप टोली का।

आगे पीछे दाये बायें, सरपट चलना टोली का।

ये रौब है वर्दीधारी का, ये रौब है वर्दीधारी का ।

गर्मी सर्दी हो बरसात, नहीं ठिकाना रहने का।

घर वालों से मिल न पाये, नहीं भरोसा खाने का।

ये रौबहै वर्दीधारी का, ये रौब है वर्दीधारी का।

घर आने का नहीं ठिकाना, जगह रेल में कभी न पाना।

गलियारे में बैठ के आना, हर फौजी का यही फसाना।

ये रौब है वर्दीधारी का, ये रौब है वर्दीधारी का।

सदा ही जीवन में मुस्काना, जीवन उनका नहीं है अपना।

देश के खातिर हर पल जीना, भारत देश की शान है सेना।

ये रौब है वर्दीधारी का, ये रौब है वर्दीधारी का।

सीमा पर है डटे ही रहना , भारत माँ के वीर सिपाही ।

उनका रौब है देश का मान, कभी नहीं डर से घबराना।

ये रौब है वर्दीधारी का, ये रौब है वर्दीधारी का।

हमें फख्र है इन वीरों पर, जिनसे दुश्मन का घबराना।

वीर प्रहरी वीर सपूत ये, माँ के सच्चे लाल सिपाही।

देश धरती का यह परवाना, इनका मान हमें है करना।

इनका रौब बनाये रखना, इनका रौब बनाये रखना।

सुरेश मंडल

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

औरत

हर औरत की यही कहानी , आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

जिसने जनम दिया है हमको, और पिलाया अमृत है।

छाती से चिपका कर जिसने, हमको रात सुलाया है।

बाहों में लोरी गा गा कर, हमको यो बहलाया है।

अंगुली पकड़ चलना सिखलाया, जीवन का संगीत सुनाया।

खुद भूखा रह हमें खिलाया, हर संकट से हमें बचाया।

आज बड़े होकर हम बालक, उसी औरत को खूब सताया।

माँ को छोड़ सभी औरत को, बासना की आँखो से देखा।

क्या पुरुष वर्ग का काम यही है, दुर्बल स्त्री का मान नहीं है।

विद्या की देवी है सरस्वती, धन की देवी लक्ष्मी जी है।

शक्ति की देवी है दुर्गा , औरत क्यों कमजोर खड़ी है।

चेत जाओ हे पुरुष अभिमानी, जिस दिन औरत जग जायेगी।

दुर्गा रूप में जब आयेगी, बन काली तब तुम्हें दलेगी।

मिट जाएगी सारी दुनियाँ, फिर पछताए तब क्या होगी।

मान सम्मान करें सब मिलकर, औरत है हम सबसे बढ़कर।

बेटी बहना भाभी चाची, दादी नानी सखी सहेली।

इनके बिना न जीवन अपना, येही तो हैं जग के माली।

येही तो हैं जग के माली। येही तो हैं जग के माली।

सुरेश मंडल

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

My father

My Father was a simple and humble small Farmers. He was the only son of his parents. He was educationally uneducated but was very wise and were able to count one to hundred . He born some where in 1900. Those days there were no schools in our village and it’s surroundings. So he could not go to school.

He was very laborious, he inherited nearly 10 bighas of agricultural land. He used to cultivate himself with the help of village labourers. He had two ox and two cows all the time. Sufficient milk was always available throughout the year. He used to take us with him morning and evening while milking out our cows and fill our big tumbler glass with hot milk while milking. We used to drink there it was so tasty that you can not imagine now.

When he married to my mother he was nearly 22 yrs. My mother supported him fully to manage agriculture and cattles. When my grandfather had grand mother died he has to sell nearly 5 bighas of land to give Mirtu Bhoj to full villagers, it was a tradition those days in the society.

We three brothers were born after granny’s death. Schools were opened in 1930s in my village. Later India got freedom 15 August 1947. Life changed, we attended schools. My elder brother passed his intermediate in1964 but my Father died before his results.

In short I can tell you that my father was a visionary person, he used to tell us I will send you to school till you are passing classes but you will not be sent to school when you fail. He kept his promise till he died and we too full filled his wishes. Today what I have achieved is only due to my parents. I love my Father and mother. Yesterday on 19th April was the 56th death anniversary, he left for his heavenly home on this date in 1964. I pray to God to bless his soul.

Suresh Mandal

Jaihind jaibharat vandemataram

नन्हा राजकुमार

रामगढ़ एक छोटा सा रियासत था। वहाँ के राजा शोभन सिंह अधेर उम्र के हो गये थे, पर अभी तक नि:संतान थे। वे प्रजापालक और रहमदिल राजा थे। उन्हीं की रियासत के एक छोटे से गाँव में साधन सिंह अपने दस साल के बेटे राजकुमार और पत्नी के साथ सुखी जीवन जी रहे थे। अपनी दस बीघे पुस्तैनी जमीन पर खेती करते और आराम से रहते थे। एक दिन वह शाम में खेतों से वापस आये तो थोड़े थके थके से थे। खा पीकर सो गये और फिर वह कभी नहीं उठ सके। बेटे के सिर से पिता का साया सदा सदा के लिए उठ गया।

राजकुमार बहुत ही होनहार और ईमानदार बालक था। पढ़ाई लिखाई में भी वह बहुत ही तेज था। पिता के मरने के बाद वह कभी-कभी अपने खेतों पर घूमने चला जाया करता था। उसका खेत एक पहाड़ी के पास था। उस पहाड़ी पर तरह तरह के बृक्ष और पौधे थे। कहीं कहीं पत्थरों का ढेर भी बिखरा हुआ था । उसे पहाड़ी पर घूमना अच्छा लगता था। इधर उधर पत्तियां तोड़ना, पत्थरों से खेलना उसे बहुत भाता था । एक दिन वह ऐसे ही पहाड़ी पर घूम रहा था और पत्थरों से खेल रहा ही था कि एक असाधारण किस्म का पत्थर देखकर उसे उठा लिया । छोटा सा कुछ मटमैला पत्थर कुछ ज्यादा ही वजनी था। उसे वह कुछ अलग सा लगा और वह उसे अपने साथ घर ले आया । वह उसे अपने सोने के कमरे में टेबल पर रख दिया । रोज दिन के तरह वह खाना खाकर सो गया । रात में जब वह गुसलखाना जाने के लिए उठा तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि उसका कमरा एक मध्यम रोशनी से जगमगा रहा है । गौर से देखने पर उसे मालूम हुआ कि रोशनी उस पत्थर से आ रही है, जिसे वह शाम में पहाड़ी से उठाकर लाया था ।

सुबह उठकर वह तैयार हुआ और अपनी माँ से रात वाली घटना बताकर, वह पत्थर लेकर राजा के पास चला गया । वह राजदरबार में पहुँच कर राजा से मिलने की अनुमति मांगी । सिपाही उस बच्चे को लेकर राजा के पास गया । बालक ने राजा का अभिवादन किया और अपनी पूरी कहानी बताकर पत्थर राजा को भेंट कर दिया । राजा राज जौहरी को बुलाकर पत्थर की जाँच करने को कहा । जौहरी पत्थर अपने हाथों में लेकर उसे जांचा परखा और राजा से कहा, महाराज यह एक अनमोल हीरा है । इसे साफ सफाई करने के बाद ही इसकी सच्ची कीमत बतायी जा सकती है । जौहरी राजा की आग्या से पत्थर लेकर चला गया और बालक अपने घर ।

दूसरे दिन जौहरी पत्थर लेकर राजा के पास आया और बताया, महाराज ये हीरा अनमोल है, इसके मुल्य तो आप पूरे राजखजाने से भी नहीं चुका पायेंगे । राजा बहुत खुश हुआ और सिपाही भेज कर बालक को आदर पूर्वक बुलवाया । राजगुरु को बुलवाकर उस बालक को राजकुमारों वाली राजसी शिक्षा देने का आग्रह किया ।महाराज समय समय पर गुरुकुल जाकर खुद उसके बारे में जानकारी लेते रहे। एक दिन राजा अपने राजगुरु से बालक को गोद लेने की बात की। राजगुरु बालक के आचरण, शिक्षा में रूचि और व्यवहार से तो पहले ही खुश थे।राजा के प्रस्ताव पर उसने भी सहमति जताई और वह बालक सचमुच में ही राजकुमार बन गया । राजा शोभन सिंह खूब धूम धाम से अपने पड़ोसी राज्यों के राजाओं को बुलाकर बालक को राजकुमार घोषित कर दिया। वहीं आये राजाओं में रतनपुर राज्य के राजा सुमेर सिंह अपनी लड़की के लिये राजकुमार का रिश्ता माँगा जो शोभन सिंह ने कबूल कर लिया । दोनों की शादी धूम धाम से हो गयी । राजा शोभन सिंह इस खुशी पर बालक राजकुमार को राजगद्दी सौंप दी और बान आश्रम को चले गये ।

ये कहानी आज ही लिखा हूँ और ये पूरी कपोल कल्पित है ।

सुरेश मंडल

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।