Monthly Archives: October 2022

हम खुशी मनाये जीवन में

आये थे अकेला जाना है अकेला, यही तो जिंदगी दो दिन का मेला ।

बचपन बीता आयी जवानी, खुशबू बन आयी तूम घर में ।

एक से हम दो हो गये ,दो होकर भी एक रहे हम।

बच्चों की किलकारी घर में, खुशियाँ लायी जीवन में ।

खुशी खुशी जीवन है बीता,क्यों रोयें हम जीवन में ।

बच्चे खुश हैं अपने घर में, हम भी खुशी मनाये घर में ।

छोड़ आश अब बच्चों की, ये दुनियाँ है हम दोनों की।

हर रोज दिवाली हो घर में, होली जैसी रंगीनी हो।

साथ साथ मिलकर घर में, हम खुशी मनाये जीवन में ।

हम खुशी मनाये जीवन में ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

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अभी से मायूस न हों

उम्र पचास भी कोई उम्र होती है, जवानी ढलने की ये तो शुरुआत है ।
बाल बच्चे अभी भी आपकी आश्रय में हैं, कालेज अभी जा ही रहे हैं ।
बिटिया शादी के लायक भी नहीं हुई है, दस वर्ष नौकरी अभी बाक़ी है ।
यही तो उम्र है लहलहाती फसल को काटने की, अभी तो आप जवान हैं ।
फ़िक्र न करें अभी से, बुढापा आना अभी बांकी है ।
हॅसते मुस्कुराते गुनगुनाते रहें, अपनों के साथ मस्ती में रहें ।
दूसरी पाली आने में अभी बहुत देर है, ढलती जवानी का मजा लेते रहें ।
हो सके तो अभी से अपने बुढ़ापे के लिये खुद प्रबंध कर लें ।
बच्चों का क्या भरोसा भविष्य में वो कहाँ और आप कहाँ रहें ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

कभी नहीं एक दूसरे को भूलना

दूध और पानी का मिलना, दोनों का सदा के लिए एक हो जाना ।
यही है असल में पति पत्नी का रिश्ता, मिलकर कभी अलग नहीं होना ।
एक दूसरे के सुख-दुःख का भागी, बाहों में नहीं साँसों में बसना ।
बेटा का परदेश जाना और बेटियों का ससुराल चले जाना ।
बुढ़ापे में पति पत्नी का ही साथ रहना, यही तो है आखिरी ठिकाना ।
दो जिस्म एक जान होकर, सारी उमर साथ बिता लेना ।
पति पत्नी का ये रिश्ता है गजब, कभी नहीं एक दूसरे को भूलना ।
कभी नहीं एक दूसरे को भूलना , कभी नहीं एक दूसरे को भूलना ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

वह दंभ में रहता है

वह दंभ में रहता है

पुरुष अपनी जवानी में दंभ में रहता है ।
पिता का बना बनाया ये घर उनका है।
धन दौलत उनका है परिवार उनका है।
अपना बचपन भूलकर वह दंभ में रहता है ।
अपने माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
घर के बाहर गराज में उन्हें सुलाता है।
रूखी सूखी रोटियाँ सुबह शाम खिलाता है।
खुद घी मलाई खाता है ऐ सी में रहता है ।
अपने बच्चों को आँखों पर बिठाता है ।
पर माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
आज जो वह माता-पिता के साथ करता है ।
कल उसका बेटा भी यही करने वाला है ।
वह यह भूल जाता है वह दंभ में रहता है ।
इनसान जो बोता है वही वह काटता है ।
माँ बाप में ही भगवान है यही भूल जाता है ।
मंदिरों में घूम घूम कर भगवानों को ढूंढता है।
पत्थरों की मूर्ति में भगवानों को खोजता है ।
माँ बाप में ही भगवान है यही भूल जाता है ।
जीते जागते भगवान को हर पल रूलाता है ।
और पत्थरों के भगवान को दूध पिलाता है।
पर माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
अपना बचपन भूलकर वह दंभ में रहता है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम