Monthly Archives: January 2021

सालगिरह

साल पच्चीस बिताए आपने, साथ साथ रह खुशी खुशी ।
छोटी सी अपनी बगिया को, महकाये हैं खुशी खुशी ।
सदा महकता रहे ये अंगना, बच्चों की किलकारी से।
धूप छाँव व बदली वाली, बना रहे घर की खुशहाली ।
घर आँगन आबाद रहे यह, प्रेम पूर्ण रिश्तों वाली ।
ईश्वर से है दुआ हमारी , युगल जोड़ी की खुशहाली ।
युगल जोड़ी की खुशहाली , युगल जोड़ी की खुशहाली ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की तैयारी है, आज देश में खुशहाली है ।

छब्बीस जनवरी सन उन्नीस पचास , आज का दिन था खासमखास ।

शमप्रभुता संपन्न राष्ट्र का, गौरव पाया था इतिहास ।

नया विधान बना करके , ये संविधान अपनाया था ।

स्वतंत्र भारत देश में, अपनी सरकार बनाया था ।

जनता की सरकार देश में , जनता शासन लाने की ।

इस दिन अपने भारत में, राष्ट्रीय त्यौहार मनाने की ।

गौरव मय यह दिन सबको, देता है संदेश हमें ।

भारत माँ का भाल सदा, जग में ऊँचा बना रहे ।

रहे फहरता सदा तिरंगा, दूर गगन में लहराये ।

ये दूर गगन में लहराये । ये दूर गगन में लहराये।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

ये दुनियाँ रैन बसेरा है

हम सभी मेहमान हैं इस जहाँ में,
आये हैं अपना फर्ज निभाने ।
घर से आये कमाने को परदेश,
अपने परिवार को खिलाने ।
न ये परदेश हमारा घर है,
न जनम स्थली ही वो जगह है ।
अपना अपना काम पूरा करके,
हमें फिर वहीं लौट जाना है ।
ये दुनियाँ तो रैन बसेरा है,
यहाँ तो दो दिन का मेला है ।
यह घर अपना है ये सब अपना है,
ये चन्द दिनों का खेला है ।
ये दुनियाँ रैन बसेरा है ।
ये दुनियाँ रैन बसेरा है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

ऐ सुबह तुम ऐसे ही आना

ये सुबह तुम ऐसे ही आना,
अपनों से तुम हमें मिलना ।
खुशियाँ लेकर हर दिन आना,
सब अपनों को रोज हँसाना ।
हिम्मत हम सबको तुम देना,
एक दूजे से प्रेम बढाना।
नहीं कभी तुम हमें रूलाना,
सबके सब को संबल देना।
उगते सूरज सी गर्मी देना,
फूलों से तुम हमें मिलना ।
बच्चों जैसा हमें तू रखना,
मन को कभी न मैला करना ।
ये सुबह तुम ऐसे ही आना ।
ये सुबह तुम ऐसे ही आना ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

औरत का सम्मान करें

औरत और मर्द एक दूसरे की परछाई होती हैं ।

एक के बिना दूसरा अधूरा होता है ।

धरती है तो पेड़ पौधे लताये, नदी नाले, पशु पक्षी सभी हैं ।

औरत है तो ये मानव का फलता फूलता समाज है ।

मर्द बाहर से कमा कमा कर धन दौलत लाता है ।

औरत उस धन दौलत को सहेजती और संभालती है।

मर्द खाद्य सामग्री जुटाता है और औरत स्वादिष्ट भोजन बना कर सभी को खिलाती है ।

औरत बेटी बहन बहू भाभी माँ दादी नानी बुआ चाची मामी के अनेक रूपों में जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी सेवा और प्यार से संसार को गति देती है ।

मर्द औरत के इर्द-गिर्द घूम कर उसे सदा सुरक्षा और सहयोग देते हुए इस श्रृष्टि चक्र को बनाये रखता है ।

जन्म से पांच साल तक औरत बच्चों की देखभाल साजसंवार और उसकी गंदगी साफ कर उसे एक नेक इनसान बनाने की भरसक कोशिश करती है तथा बुढ़ापे में भी उसकी अंतिम समय में सेवा कर मानव धर्म निभाती है ।

बदले में वह अपने लिये कुछ भी विशेष नहीं चाहती है, फिर भी उसे ताउम्र वो सम्मान नहीं मिलता है जिसकी वह अधिकारी है।

मर्दों को अपने विचार में परिवर्तन लाने की जरूरत है, औरत को सिर्फ़ भोग और काम की वस्तु न समझ कर उसे उसका उचित सम्मान और सहयोग दिया जाना चाहिए ।

ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है न कि एक पहिये की गाड़ी ही चल सकती है, उसी तरह औरत और मर्द एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं और दोनों का समान होने से ही गाड़ी सही सही चल सकती है ।

औरत और मर्द एक दूसरे के पूरक हैं ,एक के बिना दूसरा अधूरा होता है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

चाहत

चाहत होती है हम सबकी,

जीवन में आगे बढ़ने की।

बच्चे हो या हो जवान,

सब को मिले अपनी पहचान।

ये गरीबी रास्ता रोककर ,

खड़ी सामने बनी दीवार।

बचपन छीन लेती है उनकी,

पढ़ने की उसकी आवाज।

काश समझ में आये सबको,

नहीं बढ़ायेंगे परिवार।

जनसंख्या गर कम होती है,

खुशहाली होगी हर द्वार।

खुशहाली होगी हर द्वार ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।