Monthly Archives: November 2018

खतम तुम्हारी सभी कहानी

देख चिता धनवान की, हंसने लगा फकीर।
देखो कैसे जल रही, लाखों की जागीर।
चाहे बंदा मूरख हो , चाहे हो वो ग्यानी।
चाहे बंदा गृहस्थ हो, चाहे हो अभिमानी।
राजा हो या रंक हो बंदा, सबकी यही कहानी।
साथ नहीं कुछ लेकर आया, नहीं साथ कुछ जानी।
मर मर कर दिन रात कमाया,
माया यहीं रह जानी।
दान धर्म जो किया है तुमने,
वही साथ सब जानी।
छूट जायेगा साथ सभी का,
खतम तुम्हारी सभी कहानी।
चेत अभी भी तू रे बंदे,
क्यों करता मनमानी।
जग तो रैन बसेरा सबका,
सच को ले तू जानी।
अब तो सच को ले तू जानी।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

Advertisement

हरि बिन बगिया सून

बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।
क्यों कलंक लग जाय सखी री, क्यों कलंक लग जाय।
काजल की यो कोठरी, तिन पर पलंग बिछाय।
चादर बिछी सफेद सखी, दाग न कहीं लग जाय।
मन साँचा तन बावरा, तन सुख सखी अनेर।
प्यास बुझी नहीं बावली, मन में रहत अंधेर।
कौन सखी संग अंग लगाऊ, मिटे जो मन के मैल।
मिटे जो मन के मैल सखी री, लौटू बाबुल ठौर।
बिन गुरु ग्यान न बिन गुरु छाया, बिन पानी सब कुछ सून।
गुरु बिना न मिटे ये माया, जो गुरु चरणन की धूल।
सखी री हरि बिन बगिया सून।
सखी री हरि बिन बगिया सून।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

कुदरत का नियम

कुदरत का नियम भी बेमिसाल है,
एक ने साथ छोड़ा तो दूसरे का सहारा है।
लड़कियों का मायका छूटता है।
ससुराल में नया घर संसार बसता है।
रात के बाद दिन का आगाज होता है।
पतझड़ के बाद बसंत आता है।
चक्का प्रतिपल घूमता रहता है।
ऊपर का नीचे और नीचे का भाग,
अपना अपना जगह बदलता रहता है।
आज का बालक कल जवान होता है।
और जवान कल बूढ़ा हो जाता है।
कुदरत का करिश्मा निरंतर चलता रहता है।
न मेरा है न तेरा है, यह जग तो रैनबसेरा है।
हाय हाय कर कमा रहे हैं,
जीवन अपना गंवा रहे हैं।
लोभ मोह मद मत्सर में सब।
अपनों को भी भुला रहे हैं।
कर ले काम कुछ अपना भी तू।
जीवन सफल बना ले अब तू।
दान पुण्य सेवा कर बंदे।
मातु-पिता का ले आशीष।
कुदरत का है नियम अपना,
जस करनी तस भरनी है।
जस करनी तस भरनी है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

हम अच्छे तो सभी अच्छे हैं

कल अच्छा था कि आज अच्छा है।
यही सोचते हुए कि चलो सब अच्छा है।
बचपन भी अच्छा था जवानी भी अच्छी थी।
उम्र ढल गयी है और बुढ़ापा भी अच्छा है।
अगर हम अच्छे हैं तो सभी अच्छे हैं।
और हम बुरे हैं तो अच्छे भी बुरे हैं।
ये अच्छा और बुरा तो शब्दों का फेर है।
अच्छो के लिए बुरे भी अच्छे हैं।
चाहे जवान बूढ़े या बच्चे हैं।
हम अच्छे हैं तो सभी अच्छे हैं।
हम अच्छे हैं तो सभी अच्छे हैं।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

बचपन की मश्ती

बचपना की मश्ती

कागज़ की कश्ती और बरसाती पानी थी।
कागज की पतंग और डंडे की फिरकी थी।
लकड़ी वाली लट्टू और कंचो की गोली थी।
सायकिल की टायर और बचपन की मस्ती थी।
आम की बगिया और दोस्तों की टोली थी।
लकड़ी की पट्टी और चाक की बट्टी थी।
कपड़ों के सिले झोले और टाट की पट्टी थी।
सुबह से शाम तक स्कूल और मास्टर के डंडे थे।
ये था हमारा प्यारा बचपन और हम मुसतंडे थे।
आज न वो समय है और न मस्ती।
न बच्चों को फुर्सत न माँ बाप को।
मशीनी जीवन है और सब व्यस्त हैं।
हम अपने बच्चों में अपना बचपन ढूंढते हैं।
आँखे धुँधला जाती है, पर वह नहीं दीखता है।
कम्पयूटर और स्मार्ट फोन का जमाना है।
कागज की कश्ती और काँच की गोली।
ये बच्चों के खिलौने नहीं, म्यूजिम की वस्तु है।
ये म्यूजियम की वस्तु है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

पतिया

पाती लिखी पति के नाम,
मन की बातें लिख डाली।

सुन्दर मायका प्यारी भाभी,
नटखट छोटी गुडिया रानी।

पति बिना सब सूना सूना,
मायका का भाये न अंगना।

सखी सहेली बाट बटोही,
भावे नहीं अब पति बिना।

मनभावन सखी पाती तोरी,
मन की बात निराली तोरी।

दिल से दिल की बात कही,
सखी मन को बतिया छू गयी।
सखी मन को बतिया छू गयी

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

कभी वो था बचपन

दिल तो बच्चा ही है,
उम्र गुजर गयी,
पर खिलौना नहीं छूटा।
कल खेलते थे गुड्डे-गुड़ियो के संग ।
आज खेलते अपने बच्चों के संग।
ये जीते जागते गुड्डे-गुड़िया,
वो भी खेलते हैं गुड्डे-गुड़ियो के संग।
कल हम जाते थे अपने मामा के घर,
आज हम खुद मामा मामी हैं।
फर्क सिर्फ इतना ही है,
वो था मिट्टी का घर अंगना।
अमराइयों की छाँव।
गाय का दूध, बगिया का फल।
सौन्धी सौन्धी खूसबू।
मिट्टी के बरतनों में बनी दाल रोटी।
खाते थे मिलाकर घी और अचार।
आज रहते हैं शहरों में।
पक्के मकानों और फ्लैटों में।
कहाँ वो अमराई और वो गैया का दूध।
न हमें नसीब न हमारे भांजे भांजियों को।
पर आते जरूर मिलने छुट्टियों में।
दो चार दिन की रौनक फिर वही सूनापन।
कभी वो था बचपन, आज यही है बचपन।
कभी वो था बचपन, आज यही है बचपन।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।