Monthly Archives: March 2017

बुढ़ापे की बीमारी

बुढ़ापा एक बीमारी है, न हँसने की बात यही।

लेटे रहना है दिन रात, घुमना फिरना है नहीं।

खाट हमारी एक किनारे, घर के कोने सजा दी है।

सुबह शाम दिन रात वक्त पर, भोजन पानी मिल जाती है।

गरम गरम दूध व दलिया, खाने को खिचड़ी मिलती है।

ताजा फल ताजी सब्जी, रोज रोज घर आती है।

बेटा बहू पोता पोती भी, बड़े लाड़ से मिलती है।

पत्नी जब तक साथ रही, संग संग साथ निभायी है।

डाक्टर और दवायी से वो, हमको सदा बचायी है।

आज अकेला कटता जीवन, याद प्यार की आती है।

दुख में सुख में साथ निभाना, उसकी याद सताती है।

भरा पूरा परिवार हमारा, फिर भी सूना लगता है।

जिस बगिया को सजा गयी है, वह घर सूना लगता है।

आगे पीछे बच्चे अपने, फिर भी सूना लगता है।

घर सूना है दिल है सूना, ये जग सूना लगता है।

कहे सुरेश विचारे मन से, बिन घरनी बिन घर है सूना।

साथी साथ बिना जग सूना, सूना है ये जग सूना।

सूना है ये जग सूना।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरम।

Advertisement

Someone between

And some where between morning and night working for bread and butter we grew up.

And some where between life and death on the border to guard our National we grew up.

And some where between politicians and bureaucrats to get the justice we grew up.

And some where between truth and lie we grew up.

And some where between trust and untrust we grew up.

And some where between moral and immoral we grew up.

And some where between family and friends we grew up.

And some where between mother and wife we grew up.

And some where between customs traditions and new thoughts we grew up.

And some where between right and wrong we grew up.
And some where between old generation and new generation we grew up.
And we will live on, till our life and death between urning ,urning and more urning, there is no end urning. 

So urn wisely and live happily. Your earning should not be a problem for your happiness.

Jaihind jaibharat vandematram.

नारी और वृक्ष

नारी और वृक्ष एक से होते हैं,

खुश हों तो दोनों फूलों से सजते हैं।

दोनों ही बढ़ते और छंटते हैं,

इनकी छांव में कितने ही लोग पलते हैं।

देना देना ही इनकी नीयति है,

औरों की झोली भरना दोनों की प्रकृति है।

धूप और वर्षा सहने की पेड़ की शक्ति है,

दुःख पाकर भी सह लेना नारी ही कर सकती है।

नारी और पेड़ में एक अबूझ रिश्ता है,

जो दोस्ती से मिलता जुलता है।

पेड़ चाहता है कुछ पानी कुछ खाद,

नारी चाहती है सिर्फ प्यार और सम्मान।

पेड़ के जड़ों को सींचा जाता है,

नारी के मनों को मन से जीता जाता है।

पेड़ अपने जड़ों से लगकर ही जिंदा रहता है,

पर नारी से ही घर परिवार बसता है।

पेड़ों पर चिड़ियों का बसेरा होता है,

पर नारी से ही घर रहने लायक होता है।

पेड़ हमें ठंढी ठंढी हवा और छांव देती है,

नारी हमें सुख शांति और संतान देती है।

हमें पिता होने का गौरव और सम्मान देती है।

पेड़ सदा ही फलते फूलते रहते हैं।

नारी भी तिल तिल कर जलती रहती हैं।

सिर्फ हमारे और हमारे बच्चों के लिये।

हमें भी उन्हें स्नेह सम्मान देनी चाहिये।

हमें भी उन्हें स्नेह सम्मान देनी चाहिये।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरम।

मैं पीता हू्ँ

पीता हूँ दिन रात मगर मैं, सोच समझ कर पीता हूँ।

नीरा नहीं शरवत रस का ,मैं घूंट घूट कर पीता हूँ।

तन से मन से और यतन से, गीत प्रेम का गाता हूँ।

दुनियाँ चाहे कुछ भी कह ले, पीता हूँ मैं गम अपना।

खुशी लुटाकर हँसना गाना, क्या अपना क्या बेगाना।

कहे सुरेश मधु सोच समझकर, दूर सुरा से ही रहना।

पीना है तो जमकर पीना, राम नाम का रस पीना।

तू राम नाम का रस पीना। तू राम नाम का रस पीना।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरम।

दिल का ख्याल

दिल का ख्याल रखें

बहुत ही खूबसूरत ख्याल है।

दोस्तो अपना भी यही हाल है।

उमर तो उमर ही होती है।

पर दिल तो हरदम जवा होती है।

दिल का ख्याल रक्खें,

कहीं दिल टूट न जाये।

दिल ही तो एक चीज है,

कोमल पर सख्त मजबूत है।

उमर का ख्याल कर संभल जायें,

हसिनाओं को भूल जायें।

दिल पर काबू रक्खें,

दिल कहीं टूट न जाये

दिल कहीं टूट न जाये।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरम।

जाना है खाली हाथ

जाना है खाली हाथ मगर,

मैं रोज कमाने जाता हूँ।

होगी मेरी कर्मों की बातें.

पर रोज कमाने जाता हूँ।

सिर्फ बातें ही रह जायेगी,

मैं दूर सभी से रहता हूँ।

पर वक्त की तलाश में मैं,

अपनों से दूर हुए जाता हूँ।

भरना है पेट दो रोटी से,

सोने की तलाश रोज करता हूँ।

अपनों को खुश रख सकूँ,

इस कोशिश में खुद दुखी रहता हूँ।

अपनी ही आत्मा को दर्द देके,

अपनों की खुशी खरीदने जाता हूँ।

ऐसे ही भूल भुलैया में मैं,

जीवन जीते जाता हूँ।

जाना है खाली हाथ मगर,

मैं रोज कमाने जाता हूँ।

मैं रोज कमाने जाता हूँ।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरमः

ईश प्रार्थना

भगवान  करते प्यार आप से।

तुम्हें चाहते  हम सब मन से।

बसो हमारे हृदय प्रभुजी।

हमको दें आशीष प्रभु जी।

हमरे घर परिवार सभी को।
और मिले आशीष तुम्हारा।
हमरे सारे मित्र गणों को।
जन जन सुखी संसार रहे।
सबको तेरा प्यार मिले।
प्रभु सबको तेरा प्यार मिले।
जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरम।

ममता की मूरत माँ

​मृत्यु के हैं राह अनेक , जन्म देने  को केवल ​माँ​

जोड़े पाई-पाई माँ, लेती नहीं दवायी माँ।

दुःख थे पर्वत राई माँ, हारी नहीं लड़ाई माँ।

इस दुनियां में सब मैले हैं, किस दुनियां से आई माँ।

दुनिया के सब रिश्ते ठंडे, गरमा गरम रजाई माँ ।

जब भी कोई रिश्ता उधड़े, करती है तुरपाई माँ ।

बाबू जी तनख़ा लाये बस, लेकिन बरक़त लाई माँ।

बाबूजी थे सख्त मगर , माखन और मलाई माँ।

बाबूजी के पाँव दबा कर ,सब तीरथ हो आई माँ।

नाम सभी हैं गुड़ से मीठे, मां जी, मैया, माई, माँ ।

सभी साड़ियाँ छीज गई थीं, मांग नहीं वो पायी माँ ।

घर में चूल्हे मत बाँटो रे, देती रही दुहाई माँ।

बाबूजी बीमार पड़े जब, साथ-साथ मुरझाई माँ।

रोती है लेकिन छुप-छुप कर, बड़े सब्र की जाई माँ।

लड़ते-लड़ते, सहते-सहते, रह गई एक तिहाई माँ ।

बेटी का घर बसा  रहे, सब ज़ेवर दे आई माँ।

माँ से घर ,घर लगता है, घर में खुशहाली माँ।

बेटे की कुर्सी है ऊँची, पर उसकी ऊँचाई माँ।

दर्द बड़ा हो या हो छोटा , याद हमेशा आती माँ।

घर में है मंगल ही मंगल,  घर की है शहनाई माँ।

सभी पराये हो जाते हैं, होती नहीं पराई मां।

जीवन भर देती ही रहती, नहीं माँगती देवी माँ।

ममता भरी वह प्यार लुटाती,गोद सुलाती सारी माँ।

खुद जगती पर हमें सुलाती, भोर भये पर हमें जगाती।

कभी न थकती कभी न कहती, ढले उमर पर हँसती माँ।

दुनियाँ में अनमोल अगर है , है वो सबकी प्यारी माँ।

है वो सबकी प्यारी माँ।

कुछ अपनी कुछ वाट्स एप से।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमितरम।

होली

 जलायें इस होली में अपनी बुराइयाँ।

भुलायें पुराने वैर, भेद भाव ,दुरियाँ।

गले से गले मिले ,गलबहिया डालकर।

होली मनायें आपस में मिलजुल कर।

खुशियाँ बाँटे आपस में खुशी खुशी।

होली के रंग में रंग जायें खुशी खुशी।

गिले शिकवे भूलकर गले लगायें सबको।

 होली का संदेश यही  सब जन को।

नया साल लेकर आयी है नयी बहार की लरियां।

नयी उमंगे नयी नयी ये बाँटे सबको खुशियाँ।

बाँटते रहें आपस में सबको खुशियाँ।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरम।

-:- गुरु की मेहरवानी -:-“””””””””””””””””””””””””–मैने एक आदमी से पूछा कि गुरू कौन है! वो सेब खा रहा था,उसने एक सेब मेरे हाथ मैं देकर मुझसे पूछा इसमें कितने बीज हें बता सकते हो ? –सेब काटकर मैंने गिनकर कहा तीन बीज हैं!उसने एक बीज अपने हाथ में लिया और फिर पूछा इस बीज में कितने सेब हैं यह भी सोचकर बताओ?मैं सोचने लगा एक बीज से एक पेड़, एक पेड़ से अनेक सेव अनेक सेबो में फिर तीन तीन बीज हर बीज से फिर एक एक पेड़ और यह अनवरत क्रम! वो मुस्कुराते हुए बोले : बस इसी तरह परमात्मा की कृपा हमें प्राप्त होती रहती है! बस हमें उसकी भक्ति का एक बीज अपने मन में लगा लेने की ज़रूरत है!-:-गुरू एक तेज हे जिनके आते ही, सारे सन्शय के अंधकार खतम हो जाते हैं!-:-गुरू वो मृदंग है जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनने शुरू हो जाते है!-:-गुरू वो ज्ञान हैं जिसके मिलते ही पांचो शरीर एक हो जाते हैं!-:-गुरू वो दीक्षा है जो सही मायने में मिलती है तो भवसागर पार हो जाते है!-:-गुरू वो नदी है जो निरंतर हमारे प्राण से बहती हैं!-:-गुरू वो सत चित आनंद है जो हमें हमारी पहचान देता है!-:-गुरू वो बासुरी है जिसके बजते ही अंग अंग थीरकने लगता है!-:-गुरू वो अमृत है जिसे पीकर कोई कभी प्यासा नही रहता है!-:-गुरू वो मृदँग है जिसे बजाते ही सोहम नाद की झलक मिलती है!-:-गुरू वो कृपा ही है जो सिर्फ कुछ सद शिष्यों को विशेष रूप मे मिलती है और कुछ पाकर भी     समझ नही पाते हैं!-:-गुरू वो खजाना है जो अनमोल है!-:-गुरू वो समाधि है जो चिरकाल तक रहती हैं!-:-गुरू वो प्रसाद है जिसके भाग्य मे हो उसे कभी कुछ भी मांगने की ज़रूरत नही पड़ती है।