Monthly Archives: September 2022

धरती स्वर्ग समान हो

घर घर में खुशहाली हो,

पर जीवन में गुमान न हो।
अपने पराये में भेद न हो,

सभी जन एक समान हो।
जाति पांति का भेद न हो,

धर्म सिर्फ़ इनसान का हो।
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे व,

गिरजाघर सब एक हो।
ऐसा कभी भी हो जाये तो,

दुनियाँ स्वर्ग समान हो।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

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लड़कियों की आत्मकथा

जन्म लते ही दुत्कारी जाती है, करमजली कहकर बुलायी जाती है ।
रोती बिलखती टूट जाती है, अपनों द्वारा ही सतायी जाती है
भाई बाप के जूठन से पेट भरती है, माँ भी कहाँ बेटी समझती है ।
पढ़ाई लिखाई से दूर रक्खी जाती है, बचपन से ही चूल्हे चौंके में खटती है ।
कमसिन कम उम्र में ही व्याह दी जाती है, छोटी उम्र में ही माँ बन जाती है ।
औरत भी कहाँ किसी औरत के दर्द को समझ पाती है ।
पर औरत ही तो श्रृष्टि चलाती है, उसके त्याग तपस्या ही हमें इनसान बनाती है ।
औरत कभी भी वो सम्मान नहीं पाती है, जिसका वो हकदार होती है ।
छोटी उम्र में हम उसकी, नव दुर्गा रूप में कन्या पूजा करते हैं ।
बड़ी होते ही काम वासना का शिकार बनाते हैं ।
सिर्फ अपनी माँ को ही हम पूजते हैं, बांकी सबको कहाँ मान देते हैं ।
लड़की रूप में जन्म लेना ही अभिशाप है, पर लड़कियों के बिना कहाँ ये संसार है ।
लड़कियों के बिना कहाँ ये संसार है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

ठूंठ पेड़

रामजतन राय एक संभ्रांत परिवार के मुखिया थे। उनकी सैकड़ों बीघे पुस्तैनी उपजाऊ जमीन और बाग बगीचे थे। घर में चार चार बैलों की जोड़ी थी, खेती बाड़ी में काम करने वाले दस बीस नौकर चाकर थे। उसकी शादी भी एक जमींदार घराने में हुई थी । सुन्दर पत्नी जो सरल स्वभाव की मृदुभाषी महिला थी। दो साल के अंदर ही घर में पुत्र का जन्म हुआ । इसी खुशी में राय साहब ने अपने घर के सामने खुले मैदान में एक आम का पेड़ लगाया ।
समय के साथ राय साहब का बेटा अजय और उनका लगाया आम का पौधा बढ़ रहा था। पाँच साल के बाद अजय स्कूल जाने लगा और आम का पौधा बढ़कर छोटा मोटा पेड़ बन कर फल देने लगा । घर आँगन में खुशियाँ बढ़ने लगी । राय साहब के घर एक और बेटी तथा बेटा का भी जन्म हो गया । अजय कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर सरकारी अफसर बन गया और उसके छोटे भाई बहन भी पढ़ाई पूरी कर ली। तीनों बेटे बेटियों का व्याह कर राय साहब गंगा नहा लिये । घर बार की सारी जिम्मेदारी छोटे बेटे पर डाल कर वो अब दरवाज़े पर आराम कुर्सी पर बैठे बैठे समाज और आस पास के लोगों की भलाई का काम करते हुए समय बिता रहे थे ।
धीरे-धीरे राय साहब के हाथों से धन दौलत का अधिकार बेटे के हाथों चला गया । राय साहब को क्या चाहिये? समय पर बढ़िया भोजन, सेवा और सम्मान, ये सब उन्हें मिल ही रहा था। उधर उनके लगाये आम का पेड़ अब एक विशाल वृक्ष बन गया था। वर्षों से फलता फूलता पेड़ भी अब बूढ़ा हो गया था । उसपर अब कम फल आने लगा था, साथ ही उसकी कई मोटी मोटी डालियाँ सूखने लगी थी, अतः बच्चों ने उसकी कई डालों को काट काट कर ठूंठ कर दिया था। जो कभी हरी भरी पत्तियों से लदी हुई डालियों पर पंछियों की चहचहाट से गुजायवान थी, वह मात्र एक ठूंठ होकर खड़ी थी। बच्चों को घर के आगे खड़े इस ठूंठ पेड़ से घर की शोभा में रूकावट नजर आने लगी और उन्होंने इस मोटे पेड़ को एक दिन लाखों में बेच दिया ।
राय साहब को इसका बहुत दुःख था, पर उन्हें ये खुशी थी कि बच्चों ने उसे ठूंठ समझकर उनका तिरस्कार नहीं किया है, बरन सम्मान के साथ उनकी सेवा टहल करता आ रहा है । राय साहब बहुत ही खुशकिस्मत हैं कि उन्हें उनकी संतान सदा ही आदरपूर्वक सम्मान दे रहे हैं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।