Monthly Archives: November 2021

बुढ़ापे ने हमें जीना सिखा दिया है

बुढ़ापे ने हमें जीना सिखा दिया है

अजीब सी छटपटाहट होती है,
जब जवानी में बचपन याद आती है ।
मन मसोस कर रह जाते हैं,
नादानिया जब याद आती हैं ।
अजीब सी छटपटाहट होती है,
बुढ़ापे में जब जवानी याद आती है ।
मन छटपटाता है जब मस्तियाँ याद आती है ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
बुढ़ापे में अक्सर हम अकेले हो जाते हैं ।
जब अपने भी बेगाने हो जाते हैं ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
बुढापा क्या आ गया है,
सब हमें नकारा समझ रहे हैं ।
घरवाली भी पाला बदल ली है ।
खुद बच्चों के साथमिलकर,
हमें अकेला छोड़ दी है ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
जब अपने अपने नहीं रह गये हैं ।
सामने देख कर भी आँखें चुरा रहे हैं ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
कभी हम भी घर के हीरो हुआ करते थे ।
आज घर के एक कोने में पड़े हैं ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
समय ने आज सब कुछ बदल दिया है ।
बुढ़ापे ने आज फिर जीना सीखा दिया है ।
सचमुच में जिंदगी जीना सिखा दिया है ।
बुढ़ापे ने हमें जीना सिखा दिया है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

अपनों का साथ हो

अपनों का साथ हो

चाँदनी रात हो, अपनों का साथ हो ।
ईश्वर की याद हो, सुख शांति का बास हो।
दोस्तों की याद हो, मन में मिठास हो।
दुःख की दरिया भी सामने आ जाये ।
हमें क्यों इसकी परवाह हो?
हम हब तब तक सही सलामत हैं
ऊपर वाले का जबतक सिर पर हाथ हो।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

शालीनता

सैम्यता की है तू मूरत,
शालीनता की तू कसोटी ।
भव्यता के साथ ही तू,
संस्कृति की है तू बेटी।
कौन कहता है कि औरत,
घर से बाहर कुछ नहीं है ।
माँ की ममता से लवालव,
प्यार की देवी हो तुम ।
तुम सा बेटी पाके बापू,
है वो गर्वित भाग्यशाली ।
ये तुम्हारा मुस्कुराना ,
मन लुभावन है सही ।
औरत की मर्यादा तू है,
सरोस्वती की रूप तू।
औरत की मर्यादा तू है,
सरोस्वती की रूप तू।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

ख़ुवाब ख़ुवाब न हो हकीकत हो

खुवाब ख़ुवाब न हो हकीकत हो

आसमां सा चाँद तेरी बाहों में हो।
तुम जो चाहो वो तुम्हारे हाथों में हो।
हर वो खुवाब तेरी पूरी हो ।
सच कहने की तुममें हिम्मत हो।
खुवाब ख़ुवाब नहीं हकीकत हो ।
शुभ हो सदा खुशहाली हो।
अमन चैन हो सुख शांति हो।
ओउम् शान्ति ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

अजीब सी छटपटाहट होती है

अजीब सी छटपटाहट होती है,
जब बुढ़ापे में जवानी याद आती हैं ।
और जवानी में बचपन याद आता है ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
जब अपने ही बेगाने हो जाते हैं ।
बुढापे में अक्सर हम अकेले हो जाते हैं ।
नौकरी से अवकाश क्या मिला,
घरवाली भी पाला बदल लेती है ।
बच्चों के साथ मिलकर ,
हमें अकेले छोड़ देती है ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
जब अपने ही अपने नहीं रह जाते हैं ।
बुढ़ापा क्या आया है,
सब हमें नकारा समझते हैं ।
कभी हम भी घर के हीरो हुआ करते थे ।
आज दूसरों के मुहताज हो गये हैं ।
अजीब सी छटपटाहट होती है ।
समय ही है जो सब कुछ बदल देती है।
सब कुछ बदल देती है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

सूरज का संदेश


जाड़े का मौसम सुबह की गुनगुनी धूप है ।

बाग में टहलते हुए सुकून महसूस हो रहा है ।
दोपहर को बाहर गरम धूप तप रही है ।
पश्चिम में ढलते सूरज लालिमा दे रही है ।
पर ढलते हुए भी हमें ये संदेश दे रही है ।
जीवन चक्र भी यही है उगना बढ़ना और ढल जाना।
जन्मते किलकारी लेना जवानी में गर्वित होना।
सामने खड़ा बुढ़ापे का सम्मान करना ।
जनम से मरन तक सिर्फ़ देते रहना ।
सूरज का नित दिन हमें यही संदेश सुनाना ।
सिर्फ़ देते ही रहना और देते ही रहना ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

इनसान में इनसानीयत होती

कितना अच्छा होता अगर इनसान में इंसानियत होती ।
आदमी आदमी का दुश्मन नहीं उसका भाई होता ।
मिलजुलकर रहता और मिल बाँट कर खाता।
काश आदमी इनसान होता न कि हैवान होता ।
काश वह जिन्दा जीवों को काटकर नहीं खाता ।
आदमी अगर सच में इनसान होता ।
तो आज दुनिया में नफ़रत नहीं भाई चारा होता ।
बारूद से ये दुनिया नहीं जलती सुख-शान्ति होती ।
इनसान में गर इंसानियत होती तो इस दुनियाँ में ही स्वर्ग होता ।
भाई भाई में प्यार होता नफ़रत नहीं होती ।
भाई भाई में प्यार होता नफ़रत नहीं होती ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम