Monthly Archives: November 2020

चाहत

न मैं होता न वो होती , न ये शिकवा शिकायत होती ।
न गज़ल लिखने वाले होते, न ये गज़ल होती ।
कमबख़्त ये दुनियाँ भी अजीब है, वो खामखाह है रोती।
मिलना तो चाहते हैं हम, पर मिलने की जगह नहीं मिलती ।

करोना ने तोड़ा है करोड़ों दिल, यहाँ तो सजाये मौत है मिलती ।

न मिलना न मिलाना, न घूमना न फिरना।

मुँह छुपाये निकल रहे हैं, न छिपाये तो पुलिस का पकड़ना ।

दो सौ से पाँच सौ का, भारी जुरमाना भी भरना।

जान है तो जहान है, घर के अंदर ही है रहना ।

बिटिया न मायके आती, न बहू ससुराल है जाती ।

बरस बीतने को आया, घर घर नहीं हवालात है लगती ।

कितने चले गये परलोक, अपने शमशान भी नहीं गये ।

सभी को अपनी अपनी पड़ी है, जिन्दगी बेरहम जो हो गये ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

कातिल अदा

ये कातिल अदा ने मारा मुझको ।
अब क्या बच गयी है बात कहने को।
आँखों ने कतल किया है दिल को ।
ओठों की हँसी ने मारा मुझको ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

पिता का घर लौटना

पिता घर से हर रोज निकलते हैं, रोज़ी रोटी कमाने ।

शाम होते होते लौट आते हैं, दिन भर के थके हारे ।

घर में चिराग जल उठते हैं, उनके घर आ जाने से।

बच्चे खिल उठते हैं , उनके कंधों से झूल झूल के।

पत्नी झूम उठती है, उनके सकुशल लौट आने से।

माँ का कलेजा ठंढा हो जाता है, उसे सीने से लगाने से।

पर कभी ऐसा भी होता है, महीनों इन्तज़ार करते करते ।

पिता नहीं लौटते सीमा से, वे आते हैं चार कंधों पे।

पिता का घर नहीं लौटना, परिवार को छोड़ देते हैं सदमें में ।

पिता का नहीं रहना, उस परिवार का बिखर जाने में ।

पिता की अहमियत बयां करती है,

पिता की छत्रछाया ही घर को घर बनाती है ।

पिता घर की छत है, परिवार को धूप व बारिश से बचाती है ।

परिवार को धूप व बारिश से बचाती है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

देश हमारा प्यारा भारत

यह भारत देश हमारा है, इसमें बसते सब प्यारे हैं ।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, बौद्ध जैन सब न्यारे हैं ।
भाषा वेष अनेक यहाँ हैं , मिलकर रहते साथ सभी।
देश हमारा भारत प्यारा, दुनियाँ में यह न्यारा है।
इसकी धरती सोना उगले, नदियाँ नीर से भरी हुई ।
संतरंगी मौसम है इसका, उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम ।
चारो हवा बहती है इसमें, भेदभाव का नाम नहीं ।
गंगा की निर्मल धारा है, ब्रह्मपुत्र का वेग यहाँ ।
कोशी सोन महानदी भी, गोदावरी नर्मदा नदियाँ।
जंगल भरे हुए पेड़ों से, जंगली जानवर की भरमार ।
शेर बाघ भालू व चीतल, हाथी गैंडो की भरमार ।
हर मौसम में फल और सब्जी, लगते हैं भरपूर यहाँ ।
गाय और भैसों की टोली, गाँव गाँव में भरे यहाँ ।
दूध दही मकखन से भारत, देश हमारा मालामाल ।
गेहूँ चना मसूर अरहर की, मक्का ज्वार बाजरा भी।
धान की खेती होती जमके, चावल इससे ही बनते ।
सोने चांदी की खान यहाँ है, लौह अयस्क तो भरे हुए ।
अबरख ताबें की बड़ी खदानें, कोयले की भरमार यहाँ ।
कल कारखाने बड़े बड़े हैं, बिजली की न कमी यहाँ ।
सुखी सभी जनता धरती पर, रहते प्रेम से सभी यहाँ ।
भारत ऐसा देश हमारा, दुनियाँ में यह न्यारा है ।
जान से प्यारा देश हमारा, हम सबको यह प्यारा है ।
हम सबको यह प्यारा है, हम सबको यह प्यारा है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

नया फैसन

कपड़े बदले, खाना बदला,
बदला सब व्यवहार ।
जीन्स पैन्ट, अब टीशर्ट आया,
साड़ी लंहगा सूट बिदा।
माँग का सिन्दूर नदारत,
चूड़ी बिन्दिया बिछिया गायब।
घूंघट की है बात पुरानी,
लाज शरम आँखों से गायब ।
बाल कटाकर बाबकट रह गया,
लड़की तो अब लडक़ा बन गया ।
नये जमाने का ये फैसन,
घर घर में अब धूम मचा है।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

वृद्धाश्रम सनातन धर्म की देन

आज पूरे देश में विशेष कर बड़े-बड़े शहरों में वृद्धाश्रम खूब फलफूल रहा है । वहाँ एक से एक छोटे बड़े, साधारण से लक्जरी तक, सभी सहुलियत वाले वृद्धाश्रम बढ़ते ही जा रहे हैं । यह एक नया व्यावसाय हो गया है । खाने पीने, रहने, खेलकूद, क्लब, डाक्टर, नर्स सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं । जैसा आप खर्च कर सकते हैं उस तरह के वृद्धाश्रम में जाकर अपना अंतिम समय खुशियों से गुजार सकते हैं ।

आजकल माता-पिता अपने बच्चों को बचपन से ही , बड़े आदमी बनाने और विदेशों में नौकरी करने के लिए उसे प्रेरित करते हैं । बच्चे भी जी जान से मिहनत करते हैं अपने माता-पिता का सपना पूरा करते हैं । फिर बुढ़ापे में माता-पिता को बच्चों की जरुरत महसूस होती है, पर बच्चे तो तब तक विदेशी हो चुके होते हैं । उनका घर लौटना संभव नहीं होता है और तभी माता-पिता वृद्धाश्रम में शरण लेते हैं ।

यह एक अच्छी शुरुआत है, क्योंकि ये तो हमारे भारत देश में हजारों सालों से चली आ रही परंपरा है । हमारे पुरानो में भी वर्णित है । इनसान के जीवन में चार आश्रम होते हैं, पहला– ब्रह्मचर्य आश्रम , दूसरा– गृहस्थाश्रम, तीसरा– बानप्रस्थ आश्रम, चौथा–संन्यास आश्रम ।

ब्रह्मचर्य आश्रम में बच्चे गुरूकुल जाकर शिक्षा और ग्यान प्राप्त करते थे । फिर गृहस्थाश्रम में शादी कर संसार बसाते, बच्चे पैदा करते, उनका भरण-पोषण करते और सामाजिक त्रृण उतारते थे। उसके बाद बानप्रस्थ आश्रम में धीरे-धीरे अपने सारे दायित्वों से मुक्त होकर अपनी सारी जिम्मेदारियों को अपने बच्चों के ऊपर छोड़, संन्यास आश्रम चले जाते थे। तब वे अपने साथ अपने घरों से खाली हाथ ही जाते थे । इसका यह मतलब था कि संन्यास आश्रम को चलाने के लिए अवश्य ही कोई संस्था रही होगी और उसके संचालन की व्यवस्था अवश्य ही उच्च कोटि की रही होगी । अन्यथा कोई भी बुजुर्ग अपने सुखी परिवार को छोड़कर संन्यास आश्रम क्यों जाते?

अतः ये मेरी अपनी सोच है कि हमें अपने बुढ़ापे के लिये पहले से ही तैयारी कर लेनी चाहिए, ताकि बच्चों से अलग होने में कोई तकलीफ नहीं होगी । हमें कभी भी अपने बच्चों को दोष नहीं देनी चाहिए, असल में दोषी तो माता-पिता ही हैं । अतः आप अपनी जिंदगी अपने ढंग से खुशी से जियें और बच्चों को भी खुशी से रहने दें ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

बचपन की पाठशाला

चलो चलें अपने बचपन में, आज अभी हम चलते हैं ।

कर लें अपनी यादें ताज़ा, कुछ पल बचपन जीते हैं ।

नंगे पाँवो चलकर हम सब, जब स्कूल को जाते थे।

चने चबेने भर पाकिट में, खाते खाते चलते थे ।

धक्का मुक्की हँसते गाते, सभी साथ हम चलते थे।

सारे रास्ते मस्ती करते, स्कूल पढ़ने जाते थे।

वहाँ पहुँच कर एक समूह में, प्रेयर मिलकर गाते थे।

टाट बिछाकर पलथी मारकर, बैठ वहाँ हम पढ़ते थे।

अपनी अपनी स्लैटों पर हम, बोल पहाड़े लिखते थे।

गलती होने पर मास्टर की, जमकर डंडे खाते थे ।

कभी-कभी मुर्गा बनते थे, कभी डांट हम खाते थे ।

कभी शिकायत नहीं किये थे, मास्टर ने जब पीटे थे।

उसी मार के डर से भैया, लगन लगा कर पढ़ते थे।

प्राइमरी पास कर मिड्ल स्कूल में, पढ़ने हम सब जाते थे ।

मिड्ल स्कूल से हाई स्कूल तक, डंडे वाले मास्टर थे।

खूब पढ़ाते थे कक्षा में , भेदभाव नहीं करते थे।

गया जमाना सभी पुराना, मास्टर अब व्यापारी हैं ।

पैसे लेकर हमें पढ़ाते, मार पीट कर नहीं पढ़ाते ।

शिक्षा अब व्यापार हो गया, शिक्षक अब व्यापारी हैं ।

शिक्षक अब व्यापारी हैं। शिक्षक अब व्यापारी हैं ।

जयहिन्दजयभारत वन्देमातरम।

स्कूल की आधी छुट्टी का समय

सन पचास का दशक और हमारे स्कूल की आधी छुट्टी का समय । हम सभी बच्चे चार से सात वर्ग वाले ,अपनी अपनी लंच बाक्स निकाल कर कोई क्लास में ही तो कोई स्कूल के मैदान में बैठकर मिलजुलकर खाते थे । आज की तरह हमारे पास न वो स्टील या टप्पर वेयर की टीफीन होती थी न ऐसा खाना । ज्यादातर बच्चे रोटी सब्जी अपने टीन के डब्बे में लेकर आते थे, पर माँ के हाथों बनी वो रोटी सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट होती थी।

हममें से कुछ बच्चे स्कूल के बाहर खोमचे वाले बाबा से घुघनी, फुलौरी तथा आलूदम एक एक आने का खरीद कर खूब चटकारे ले लेकर खाते थे । बाबा ये सब अपने घर से बना कर लाते थे और एक कपड़े से खोमचा ढककर रखते थे ताकि धूल मक्खी न पर जाय। आज जब अपने नाती नातिन, पोते पोतियों को टिफ़िन और पानी की बोतल स्कूल ले जाते देखता हूँ, तो हमें हमारा वो बचपन वाला गाँव वो अपना स्कूल याद आता है और पुरानी यादों में खो जाता हूँ । समय गुजर गया और कितना परिवर्तन हो गया । वो बिना चप्पल जूतों के पैदल स्कूल जाना, न कोई यूनिफॉर्म न बाहन। पर आजकल वो सबकुछ तो है पर वो हमारी संस्कृति और संस्कार नहीं रह गया है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

हम मौत से लड़ रहे हैं

जिसने बनाया है ये श्रृष्टि, वही इसे चला रहे हैं ।

जिसने बनाया ये पेड़ पौधे, वही बनाये ये नदी व नाले।

जिसने बनाया है जमी आसमान, वही तो बनाये हैं इनसान ।

इनसान निकले इतने बेवफा, वो उसी श्रृष्टि को मिटा रहे हैं ।

जंगल से पेड़ पौधों को काट काट कर जला रहे हैं ।

नदियों की तलहटी से बालू निकाल, उसे सुखा रहे हैं ।

जंगली पशुओं पक्षियों को मार मार कर खा रहे हैं ।

पौधों बिना बारिश होती है कहाँ ,नदियाँ सूख रहीं हैं ।

कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं, हवा गरम हो रही हैं ।

इनसान बढ़ रहे हैं और संसाधन कम हो रहे हैं ।

दुनियां मौत के कगार पर खड़ी है, हम नींद में सो रहे हैं ।

प्रकृति से खिलवाड़ कर, हम मौत से लड़ रहे हैं ।

हम मौत से लड़ रहे हैं, हम मौत से लड़ रहे हैं ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

साहसी लड़की

21 साल की खूबसूरत सीमा, एक खेल शिक्षक के साक्षात्कार के लिये गयी हुई थी, शहर के एक बड़े नामबर स्कूल में । वहां स्कूल के प्रेसिडेंट, उसका जवान बेटा, प्रिन्सिपल और दो टीचर के पैनल में उससे उसकी योग्यता, अनुभव आदि के बारे में विस्तार से पूछा गया । वह सभी के प्रश्नों का उत्तर संयत और शालीनता से दे रही थीट। इस बीच नौजवान लड़का उसे खा जाने वाली नजरों से घूरता रहा और अंत में उसने घटिया मुस्कान के साथ सीमा से अपने कोई खेल का प्रदर्शन करने के लिए कहा । सीमा उसके व्यवहार से पहले ही दुःखी थी। वह संयत से उठी और लड़के के पास जाकर एक जबरदस्त घूँसा उसके नाक पर दे मारी । लड़का बेहोस होकर कुर्सी से नीचे लुढक गया और उसकी नाक से खून की धारा बहने लगी । यह देखकर लड़के के बाप को हार्ट अटेक हो गया । सीमा अपना सर्टिफिकेट उठाकर शांत भाव से वहाँ से निकल गयी। बाप बेटे को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहाँ बाप को मृत घोषित कर दिया गया और लड़के को आपातकालीन गहन चिकित्सा में रक्खा गया ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।