Monthly Archives: October 2018

मेहनतकश

हर किसी का अपना दिन, खुशी व गम में ही गुजरती है।

कोई रोकर गुजार लते हैं, तो हॅसकर बिता लेते हैं।

क्यों गम में दुखी हो सुरेश, ये तो बादल हैं छट जायेगा।

ये शहर करम करने के लिए है, सोचने से परेशान क्यों होते हो।
बात उनकी भी सोचो सुरेश, जो मखमली सेज पर भी।

रो रो कर परेशान होते हैं, छतीचसो प्रकार के भोग सामने हैं।
पर खाने को तरस जाते हैं, बिना नमक की खिचड़ी ही खाते हैं।
खुदा का शुक्र है सुरेश, मेहनत कश जन्नत में रहते हैं।

मेहनत कश जन्नत में रहते हैं। जन्नत में रहते हैं।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

जहर इश्क है

इश्क जहर का भी अमृत है,

पीने वाला खुशकिस्मत है ।

न पीये वो जन मूरख है,

पीया नहीं जीकर भी मृत है।

गरल पीया शिव शंकर जी ने,

तू भी पी ले गरल इश्क का।

सुख शांति का गरल इश्क है,

जीवन का यह परम सत्य है।

सुख शांति का गरल इश्क है।

सुख शांति का गरल इश्क है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

कविवर

तुम मनुज नहीं थे इस बहुधा पर,

नमन तुम्हें है हे कविवर।

जो रचना रच तुम चले गये ,

वो रचना अमर है हे दिनकर।

हम भारत वासी हिन्दी जन,

करते हैं नित दिन हम वंदन।

वो अमर गीत वो गाथाएँ,

वो अमर कृति हैं हे कविवर।

तुमको है शत नमन हमारा,

भारत के इस पुण्य भूमी पर।

तुम अमर सदा इन गीतों में ।

तुम अमर सदा इन गीतों में।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

दुख

एक पथिक थका मांदा पीपल की छाँव में विश्राम कर रहा था। पास ही एक मीठे जल का कुऑ था ।वहीं दो चार पनिहारन पानी भर रहीं थीं। वे आपस में अपनी अपनी घर की परिचर्चा कर रहीं थीं। एक ने कहा सखी आज अष्टमी है और मेरे बच्चे इस साल भी घर नहीं आये। पैसे तो महीने महीने भेजते रहते हैं, पर त्योहार तो बच्चों के बिना सूना सूना ही लगता है।

दूसरी ने कहा सखी, मेरे बच्चे तो तीन साल से घर नहीं आये। हम दोनों पति पत्नी आसरा देखते रहते हैं, कि वह कब लौटे और छाती से लगाउ। घर में रूपये पैसों की कमी तो है नहीं,पर पोते पोती को दुलराने का बहुत मन करता है। घुटनों के बल चलता था तभी वह गया है।

तीसरी सखी बोली , बहना अब तो घर काटने को दौड़ता है बच्चों के बिना। दसियों साल हो गये बबुआ के गये। पढ़ने को भेजा था, तब हम कितने खुश थे कि बबुआ बड़ा बाबू बनेगा, उसका सेहरा सजाऊंगी, घर में बहुरिया आयेगी, रूनझुन रूनझुन उनकी पायल से घर गूंजेगा, पोते पोती खेलेगी अंगना। पर सब सपना ही रह गया। गोरी मेम से व्याह कर वहीं बस गया। हमारी सुध भी नहीं ली।

चौथी सखी व्यंग से हँसी और बोली, सखी दुख तो हमें भी है, निपूती होने का। पर आपलोगों के दुख को सुनकर, लगता है मेरा दुख तो कुछ भी नहीं। और चारो पनिहारन पानी भर कर चली गयी।

पथिक विचार करने लगा, वह किस भ्रम में जी रहा है। उसका अपना बेटा भी तो पढ़ने विदेश ही गया है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

मायका

बिटिया का सम्मान है मायका, बिटिया का अरमान है मायका।

बचपन और जवानी गुजरी, बिटिया का गुमान मायका।

मायका है बिटिया का सपना, मायका है बाबुल का अंगना।

मायका में है भैया भाभी, हँसी ठिठोली अपनापन।

बुआ आयी बुआ आयी, बच्चों की किलकारी मायका।

रूनझुन रूनझुन उन पायल की, याद बसी उस अंगना में।

कैसे मोह मैं छोड़ सकूँ जी, छुपन छुपाई अंगना में।

शाम भतीजे को मैं देखी, भागे बहना के पीछे।

लौट गयी अपनी बचपन में, भैया जब मुझको ढूँढे।

जबतक मैया रही हमारी, मायका थी हमको प्यारी।

माँ के साथ ही दूर हो गयी, मायका अपनी वो प्यारी।

अब तो आश लगी रहती है, अपनी बिटिया रानी की।

आयेगी कब साथ में लेकर, अपने बच्चों को प्यारी।

गोद खिलाने लार लगाने, उनको मन होता अपना।

मायका अपनी भूल चुकी हूँ, बन नानी अपने घर अंगना।

माँ बाबा के बाद में मायका , हुआ पराया है अपना।

बचपन की बसती यादों को , बच्चों के संग है हँसना।

भूली बिसरी यादें को अब, बच्चों के संग है जीना।

बच्चों में ही अपना बचपन, शाम सवेरे है जीना।

अब शाम सवेरे है जीना, अब शाम सवेरे है जीना।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

नर में तू नारायण हो

नर में तू नारायण हो , बस नारायण ही रहना।

घर बाहर और सभी जगह पर, काम सभी का आना।

शेर बने रहना तुम हर पल, सीमा चौकी के उपर ।

दुश्मन भी कांपे देख तुम्हें, तुमको अपने उस पथ पर।

भारत माता के लाल हो तुम, वीरों की भांति रहना।

नर में सच नारायण हो , बस नारायण ही रहना।

घर बाहर और सभी जगह पर, काम सभी का आना।

तुम काम सभी का आना, तुम काम सभी का आना।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।