Monthly Archives: July 2018

औरत का सम्मान

आफिस से लौट घर में पैर रखते ही शुकून और खुशी का अहसास होता है। जिस घर में एक कुशल गृहणी रहती हैं। साफ़ सुथरा घर, धुले धुलाये कपड़े, करीने से सजे सजाइए सामान, चहकते फुदकते बच्चे, घर की मंदिर से फैलती अगरबत्ती की खुशबू, रसोई से आती सोधी सोधी महक, बैठक में इन्तज़ार करती मुस्कुराती सजी सवरी पत्नी। दिन भर की भागा दौड़ी , बास की डांट क्षणभर में ही सब भूल , मन खुशियों से भर जाता है।

कौन कहता है कि घरेलू महिला दिन भर बेकार बैठी गप्पें हांकती रहती हैं? सुबह-सुबह पति और बच्चों को आफिस तथा स्कूल भेजकर, लग जाती हैं घर सवारने। साफ़ सफ़ाई से लेकर कपड़ों की मरम्मत, बिटिया के लिए नयी नयी फ्रांक सिलना, नमकीन और मिठाई बनाना, सास ससुर और रिश्तेदारों की सेवा आवभगत। हर मौसम में अचार डालना, कभी आम की, तो कभी मिर्ची की, बेमौसम में सब्जियों की मिक्स मसाले दार अचार जो हम हाथ चाट चाट कर खाते हैं। तीज त्यौहार पर तरह तरह के पकमान और स्वादिष्ट भोजन बना कर सबको खिलाना। क्या ये सब काम नहीं है? अगर सचमुच में इनके काम की मजदूरी दी जाए तो एक मध्यवर्गीय परिवार की कमाई कम पड़ जायेगी। सच तो यह भी है कि घरेलू महिला की ड्यूटी सातो दिन, बारहो महीने और चौबीसों घंटे की रहती हैं। उनको उनके पूरे जीवन काल में एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिलती है। फिर भी हम ताना देते हैं कि दिनभर करती क्या हो? इसीलिये किा शायद वह महीने के अंत में वेतन लेकर घर नहीं आती हैं। पर क्या वह घर में रहते हुए हमसे कम कमाती है? यह हम पुरुषों की ग़लत फहमी और स्त्री जाति का अपमान है।

आयें हम सब अपना सोच बदलें और उन्हें उनका सम्मान दें, जिनका वो अधिकारी हैं। परिवार और समाज में महिलाओं के योग दान को कभी भी कम करके नहीं आंका जा सकता है। वे गाड़ी के दो पहिये में से एक हैं। जैसे गाड़ी के दोनों पहियों का समान रूप से एक तरह होना जरूरी है, वैसे ही समाज में पुरुष और महिला का।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

मोबाइल

मोबाइल सचमुच ही बन गया है,
हम सबका अनोखा साथी।
बिना इसके नहीं गुजरता है दिन,
साथ हरदम रहता है हमारा साथी।
पर दुखदायी भी है इसका साथ,
एक दूसरे को लडवाता है बिना बात।
हम भूल चुके हैं अपनों से मिलना,
टूट चुके हैं हमारे रिश्ते और आना जाना।
बातें जरूर होती है उन सबो से,
पर मर चुका है जमीर हमारा।
समय नहीं है हम सब के पास,
आपस में बैठ दो बातें करने का।
चाय की चुस्की और गप्पे लगाना।
एक दूसरों की सुनना और सुनाना।
आलसी और चिड़चिड़ा बना दिया है,
ये खिलौना हमें अपनों से बेगाना दिया है।
हमें बेगाना बना दिया है।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

सदाचार

धनवान बनने के लिए, कण कण का
संग्रह करना होता है।

पर गुणवान बनने के लिए, एक-एक क्षण का
सदुपयोग करना होता है।

इस जीवन का पैसा ,अगले जन्म काम आता नहीं।
पर जीवन का पुण्य कर्म, जन्मो जन्म भुलाता नहीं।

मीठा बोल बोले , सब का दिल जीते।
करबी बोल न बोलें ,दिल न किसी का तोड़े।

करें उपकार सबका, न सोचें बुरा किसी का।
न कर्जदार बने जीवन में, दाता ही बने रहना।

साफ मन का बने रहें, न कभी दूसरों का बुरा सोचें।
खुश मिजाज बने रहें, कभी किसी की न बुराई करें।

परमात्मा भी तुम्हारे साथ होगा, उनका गुण गाते रहें।
खाली हाथ आये थे, खाली हाथ ही जाना है।
इसे याद रक्खें भूलें नहीं, नेकी कर दरिया में डाल।
कर भला होगा भला। तू कर भला होगा भला।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

प्यारा बचपन

याद दिलाती है बचपन की,
ये भींगी भींगी बरसातें।
देखकर अपने ही बच्चों को,
खेलते कूदते मस्ती में।
कब रूठ गया कब चला गया,
अपना वो प्यारा सा बचपन।
वो मस्ती वो आवारापन ,
कब हमसे रूठ कर चला गया।
पर गया नहीं है नटखटपन,
बच्चों सा मचलता मेरा मन।
नाती पोतों में ढूढ रहा हूँ,
अपना वो प्यारा बचपन।
जब जब वो शोर मचाता है,
आपस में मस्ती करता है।
तब याद हमें फिर आती है,
अपना वो प्यारा बचपन ।
अपना वो प्यारा बचपन।
अपना वो प्यारा बचपन।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

फौजी की रेल यात्रा

बहरे कभी नहीं सुनते हैं, और न गूँगा बोल सका।
गूँगी बहरी सरकार हमारी, गूँगे बहरे शासन है।
सबसे सस्ती जान देश में, सैनिक का अपमान है।
कभी नहीं ये शासक सोचा, सैनिक सफर ये करता है।
जिस दिन छुट्टी मिलती उसको , जाना उसी दिन होता है।
सीट रिजर्व की बात न पूंछो, धक्के खाता फिरता है।
टीटी गाँठ से पैसा लेकर, उसको जाने देता है।
लाचारी है फौजी सबको, घर तो जाना होता है।
बाप की अर्थी पड़ी वहाँ है, कंधे देने जाता है।
बहना की शादी पर फौजी, प्यार जताने जाता है।
बहना की राखी का फौजी, लाज निभाने जाता है।
वह लाज निभाने जाता है, वह लाज निभाने जाता है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

Cure of Nose deases

Take

1) Dalchini

2) Sonth

3) Kali mirchi

4) Pipli

All equal quantity, power it and take daily one tea spoon full with honey early in the morning. Stay fit from jukam, nose running and snoring.

Here’s health show.

पिया मिलन की आस

नयना बरसे रिमझिम रिमझिम, पिया तोरे आबन की आश।
अंखिया तरसे नितदिन नितदिन , पिया तोरी देखन को बाट।
सांझ सवेरे नितदिन बैठी, जीया मोर भयल उदास।
बरस बीत गयल गौना कराये, मोहे छोड़ गये ससुराल।
पिया मिलन की आश लगाये, तरपत रहूँ दिन रात।
उमर बीत गयल बीस बरसिया, जीयरा धड़के हमार।
सासु ननदिया ताना मारे, दिनन दुपढिया रात।
कौन शौतनिया संग तू बारी, छोड़ उसे घर आजा।

रख लो मोरी लाज सजनमा, रखो हमारी लाज। सैयां रखो हमारी लाज।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

अवकाश के बाद

अवकाश पर आने पर बंदे का क्या हाल है।
घर बैठने पर आजकल ये बात है।
घर में बेटे बहू का समराज है।
अपनी पत्नी तक न करती बात है।
खुलकर हंसने पर भी बिराम लगती है।
सुबह की चाय का भी इन्तजार रहती है।
निठल्ले बैठे रहने वालों की क्या औकात है।
यही सुनने को मिलता दिन रात है।
घुट घुट कर जीना है तो रहो बेटों के संग।
खुलकर जीना है तो रहो अकेले बीबी के संग।
बरसात में मजे ले लेकर खाओ पकौड़े।
बीबी संग डोलो कमरिया पकड़ के।
न रोका न टोकी न बच्चों की खटपट।
मरज़ी से सोओ और मरज़ी से जागो,
काहे की फिकर है और काहे का गम।
हंसते गुनगुनाते रहो बुढापे में भी संग संग।
काहे की फिकर है और काहे का गम।
काहे की फिकर है और काहे का गम।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

कलह की जड़

आज हम जिस माहौल में रह रहे हैं, वहां आपसी कलह रोजाना की बात हो गयी हैं। हर दिन हर जगह चाहे पास पड़ोस हो या खुद का अपना परिवार। कोई न कोई बात को लेकर कलह हो ही जाती है और फिर पूरा दिन घुट घुट कर, सोच फिकर में ही गुजरती है।

कल की ही बात है, पति के सिर्फ इतना कहने पर, कि आज लगता है सब्जी कुछ जल गयी है। पत्नी ने भुनभुनाते हुए कहा, अगर एक दिन जली सब्जी खा ही लोगे तो कौन सी आफत आ जायेगी? दिन भर गदहे की तरह गिरहस्ती में खटती रहती हूँ, कभी न चैन न छुट्टी, क्या घर गृहस्थी केवल मेरी है? पति बेचारा चुपचाप खाकर काम पर निकल गया और पूरे दिन धूप में खिन्न मन से मजदूरी कर शाम में घर वापस आया। घर में पांव रक्खा ही था कि पत्नी की चिल्लाने और बच्चों की रोने की आवाज़ से सदमें में आ गया। वह सुबह की भरास बच्चों पर निकाल रही थी। पति सोचने लगा, मैंने कौन सी बड़ी बात कही थी? सच ही तो कहा था। दोनों का दिन बहुत ही कष्टदायक बीता। ऐसे बहुत सारे किस्से कहानियां आप को सुनने को मिलेगी। पर मूल कारण सब के सब एक दूसरे को नीचा दिखाने और अपने को बेहतर साबित करने का ही है।

इस प्रसंग पर विचार करें और अपने घर को कलह से दूर रक्खें। छोटी मोटी बातें तो परिवार में होती ही रहती हैं, इसे नज़र अंदाज़ करें और सुख से रहें।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।

खूब बनाओ यार

इनसा जब बुड्ढा हुआ, देख कबीरा रोय।

इन बुड्ढों को साथ में, रखता नहीं है कोय।

इनसान क्या बुड्ढा हुआ, हाल हुआ बेहाल।

बेटा छोड़ परदेश गया, बेटी बसे ससुराल।

घर का रहा न घाट का, सब लिया किनारा काट।

नाते रिश्तेदार भी, अब करते नहीं हैं बात।

सुन्दर काया भी गयी, झुकी कमरिया और।

अंखियन से दीखत नहीं, बहरा कान भी होय।

दाँत टूट पोपली भयी, मुखरा नहीं सुहाय।

अंग अंग टूटे बदन, करे न कोई ख़याल।

बूढ़ा बूढी साथ में, जपते माला हाथ।

राम राम जपते रहे, कबीरा तुम्हीं सहाय।

रोते रोते भी कहे, बच्चे रहे खुशहाल।

जहाँ रहे हॅसते रहे, उनके प्रिय नौनिहाल।

कबीरा ऐसे ही कहे, ये जग एक सराय।

न काहू की सनद रही , नहीं कोई परिवार।

अपनी करनी कर चले, पगला साहूकार।

जोर धरी जो सोना चाँदी, रहा पड़ा बेकार।

काम नहीं आया कभी, जब काया हुई बीमार।

कलियुग में कबीरा कहे, काम तो आबे यार।

कहे सुरेश जी तभी जना से, सभी बनाओ यार।

भैया खूब बनाओ यार, भैया खूब बनाओ यार।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम।