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बंधन

जिसे बंधन समझते हम,वह बंधन बंधन नहीं है

वह है डोर जो हमें जोड़ती है,बिन बाँधे ही हमें बाँधती है

पर किससे और किसको,हमें ख़ुद भी तो पता नहीं है

ये बंधन ,बंधन भी है या नहीं,जिससे बँधकर हम बँधे हैं

आपस में मिलकर रहतेहैं ,इस धरा पर हम खड़े हैं

क्या इसलिये कि हम ,अकेले रहना नहीं चाहते?

या फिर अकेले ही हम रह नहीं सकते?

है यह प्रश्न या कि उत्तर,फिर हम क्या चाहते हैं

बंधन जो बिना बाँधे ही,हम सबकोबांधता है

वह डोर जो न दिखायी देता है,और नहीं दीखता है

पर है वह ज़रूर कोई बंधन,जो हमें बाँधता है

अपनों से,गगन,और धरती से,जहाँ हम जमे हैं 

पले और वढ़े हैं,एक ही तो हवा है

सूरज की रोशनी,व चंदा की चाँदनी

सगर का नीर और हिमालय की छांव 

गंगा यमुना का पानी ,या कृष्णा कावेरी का

दक्षिण की मलियानल या पश्चिम का झकोर

यहाँ कुछ भी तो अलग नहीं है

फिर हम क्यों चाहते हैं तोरना,उस डोर को

जिसने हमें बिन बाँधे ही बाँधा है ,बिन बाँधे ही बाँधा है

हमें प्यारा है ये बंधन ,बंध कर रहना हमें भाया है

आओ हम सब मिलकर ,बँधे रहने की क़सम खायें

इस अनदेखी डेरी से,अपने देश और मातृभूमि से

जयजयकार करें भारतीयता की,गांधी के सपनों के भारत की

सपथ लें साथ मिलकर रहने की,बंध कर इस डोरी से

प्रेम के इस बंधन से,जो हमें बाँधा है

अपने इस वतन से,इन्सान की इनसानियत से

मानवता के धरम से,बुद्ध ,ईशा रहीम व नानक से

पर वास्तव में यह बंधन है? जो हमें बाँधा है

नहीं यह बंधन ,बंधन नहीं है,यह बंधन नहीं है

यह बंधन नहीं है