यादें बचपन की

क्यों याद दिलाती हो बिटिया तुम,

गाँव के उस प्यारे बचपन की।

गाँव की सोंधी मिट्टी प्यारी,

खेतों और खलिहानों की।

बरसों बीत गये अब छोड़े,

गाँव के इस गलियारों की।

भूल गया था जिसको हमने,

अपने घर और गाँवों को।

कहाँ रहा वो घर अब अपना,

कहाँ खो गयी वो गलियाँ ।

पशुओं का वो झुण्ड कहाँ है,

बचपन वाला दौड़ कहाँ है।

जिसे बुलाते थे बचपन में,

दौड़ भाग कर आता था।

वो साथी संगी सब अपना,

कुछ तो हैं कुछ छोड़ गये।

भाग दौड़कर, लड़ना भिड़ना,

याद दिलाये कौन यहाँ।

न रही है वो गलियाँ अब,

वो नहीं रहे बचपन का खेल।

गाँव हमारा शहर बन गया ,

नहीं रहा वो मेल मिलाप।

मिलबांट कर खाना पीना,

भूल गये हैं सारे लोग।

बाहों में बाहें डाले अब,

नहीं घूमते अबके लोग।

होली और दिवाली पर अब,

धूम मचाना बच्चों का,

रबड़ी साथ में चने चबेने,

जेबों में भर भर लाना।

घूम फिर कर खाते रहना,

बचपन का था यही जमाना,

बस ये गुजरी याद रह गयी।

बचपन खो गया है बच्चों का,

स्कूल जाता तीन साल का।

स्मार्ट फोन कम्प्यूटर से वह,

हर वक्त है वो खेल रहा।

मशीनी युग में आज ये बच्चे,

अपने माँ को भूल रहा।

क्यों याद दिलाती हो उस पल की,

जो कल का इतिहास बन गया ।

आओ मिलकर आज मनायें,

खुशियाँ वाली आज दिवाली।

भूल के अपना प्यारा बचपन,

बच्चों संग हम खुशी मनाये।

शायद बच्चों के ही संग में ,

बचपन अपना लौट ही आये।

बचपन अपना लौट ही आये।

जयहिन्द, जयभारत, वन्देमातरम।

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