हम बिक रहे हैं


बिक चुके हैं हम, हर रोज बिक रहे हैं ।
यहाँ जमीं बिक रही है, आसमान बिक रहा है ।
घर बिक रहा है, खलिहान बिक रहा है ।
हम बिक रहे हैं, ईमान बिक रहा है ।
देश बिक रहा है, देश गद्दार बिक रहा है ।
पैसों के लिये बिचौलियों की माँ बहन बिक रही है ।
कुछ लेखक और कवि भी आसानी से बिक रहे हैं ।
इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ हर कोई बिक रहा है ।
और जो नहीं बिक रहे हैं, अपमानित हो रहे हैं ।
और बिकने वाले नोबेल पुरस्कार पा रहे हैं ।
कोयले तो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं ।
पर हीरे बहुत ही मुश्किल से मिल रहे हैं ।
कोयले सब जगह जलाये जा रहे हैं ।
और हीरे तिजोरियों में संजोये जा रहे हैं ।
हीरे तिजोरियों में संजोये जा रहे हैं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

चिंता नहीं चिन्तन करें

चिंता नहीं चिन्तन करें, धन जोड़े या घर जोड़े ।
माता-पिता के साथ रहें या उनको छोड़ अकेले रहें ।
बच्चों को कामयाब बनायें या उनको अपने पास रक्खें ।
पढ़ाना है गर उनको दूर तब उनसे रहें ।
अच्छी कमाई वाली नौकरी करानी है तो अकेले रहें ।
जमाना चला गया जो बापदादो की खेती थी।
बड़े बड़े बाग बगीचे और सैकड़ों बीघे जमीन थी।
आज पुस्तैनी खेती बंटकर टुकड़ों में बिखर गया है ।
बाबा के कुनबे अब बीस कुनबो में बंट गया है ।
घर से बाहर नहीं निकले तो खायेंगे क्या ।
पढेंगे लिखेंगे नौकरी करने बाहर जाना ही होगा।
परिवार माता-पिता और नौकरी में तालमेल बैठाना ही होगा।
बच्चों को घर से बाहर रहकर परिवार चलाना ही होगा ।
बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करनी ही होगी ।
बुढ़ापे में उन्हें साथ रखकर सेवा करनी ही होगी ।
समय की मांग है समय के साथ चलनी ही होगी ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

सबला तू तो है सदा

नारी तू है नारायणी,अधिकार तुमको है सदा ।
समाज व परिवार से, आशीर्वाद ईश्वर का सदा ।
तुम सदा संपूर्ण थी और रहोगी ही सदा ।
पुरुष भी पलते तुम्हारे, आँचलो में ही सदा ।
मर्म समझा है नहीं, नारायणी का वो सदा ।
दुर्भाग्य है समाज का, जो अपमान करता है सदा।
हे नारी तू है नारायणी, सबला तू तो है सदा ।
धिक्कार उस परिवार को, जो छल रहा तूझको सदा ।
पर पूजते संसार में हैं, देवियों को वो सदा ।
शक्ति रूपा है तू दुर्गा, विद्या रूपा सरोस्वती काल रात्रि कालिका तू, लक्ष्मी तू धन की देवी ।
तीनों देव हैं साथ तुम्हारे, तेरे बिन वो सदा अधूरे ।
नर से बढ़कर नारायणी तू, हम तो हैं बस बालक तेरे ।
नारी तू है नारायणी, नमः नमो हे मातेश्वरी ।
नमः नमो हे मातेश्वरी, नमः नमो हे मातेश्वरी ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

मिट्टी के खिलौने

ये जिंदगी फूल और पत्थर की है कहानी ।
बचपन हमारा फूल है पत्थर है जवानी ।
बचपन का खिला फ़ूल बिखरकर जवानी बनी।
घिस घिस कर जवानी एक कहानी बनी।
फूल थे कभी समय के हिलोरे से पत्थर बने ।
जीवन के अंतिम समय में न फूल रहे न पत्थर रहे ।
हम तो मिट्टी के खिलौने थे मिट्टी से मिले ।
मिट्टी के खिलौने थे मिट्टी से मिले ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो,
री मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ।
भोर भयो गैयन के पाछे मधुवन मोही पठायो।
कानन में दिन खेल बितायो, साँझ भये घर आयो।
री मैया मोरी मैं कब माखन खायो ।
मैं बालक बहियन को छोटो, छीको कछु विधि पायो।
री मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परों हैं, बरबस मुख लपटाओ।
री मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ।
सब गोपियन मोहे बहुत सतयो,
नहीं यशोदा के  लाल तू जायो। कही कही मोहे चिढ़ायो।
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ।
बलदाऊ हैं गोरे गोरे, कारो शाम तू गोद लिवायो। 
नहीं यशोदा के लाल तू जायो।

अब न रहूँ मैं साथ ये तोरो।
ले लो अपनी लकुटी कमलिया, बहुत ही नाच नचायो।
मैया मोरी मैं कब माखन खायो ।
री मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो ।
सूरदास तब बिहूसी यशोदा ले उर कंठ लगायो,
कन्हैया तू मैया के जायो, तू मैया के जायो ।

ललना तू नहीं माखन खायो । ललना तू नहीं माखन खायो ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

मैं खेलाउ तेरा बेटा

बेटा बेटा मत कर सासु, अब तेरा बेटा मेरा है।
बेटा जब तक रहा कुँवारा, तबतक बेटा तेरा है।
व्याह भया मैं तेरी दुलहन , बेटा अब तो मेरा है।
सोच समझकर बोली सासु, हाँ अब बेटा तेरा है।
मेरी आँचल हुई पुरानी, तेरी आँचल नयी नयी ।
तू इस घर की रानी बिटिया, अब हम तेरी अम्मा हैं ।
ले संभाल तू इस बेटे को, और झुलाओ झूलो में ।
राग रागनी उसे सुनाओ और सुलाओ गोदी में ।
भूल न जाना इस अम्मा को, पाल पोस कर दिया है बेटा।
रखना साथ साथ ही हमको , मैं खेलाउ तेरा बेटा ।
मैं खेलाउ तेरा बेटा ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

पत्नी के बिना पुरुष अधूरा है

ईट गारों से शानदार महल बनवाया।
रंग रोगन करवा इसे खूबसूरत बनाया ।
कीमती झाड़ फानूस और फरनीचरो से सजाया ।
घर के बाहर बड़ी सी तख्ती पर अपना नाम खुदवाया ।
महल देख देख खूब इतराया।
पर ये महल महल ही रहा घर कभी न बन पाया।
पर जब इस महल में पत्नी को व्याह लाया ।
तभी ये महल घर और मंदिर बन पाया ।
नाम की तख्ती लगा लेने से घर किसका हुआ ।
घर तो घरवाली के घर में रहने से घर हुआ ।
हे प्रियतमा तू क्यों नाम की तख्ती के लिये रोती है ।
मैं भी तुम्हारा हूँ ये घर भी तुम्हारा ही है ।
क्या कहीं सीता के बिना राम को देखा है।
कोई राम राम नहीं कहता सभी सीताराम कहता है ।
सभी राधेश्याम कहता है ।
सीता के बिना राम अधूरा है और पत्नी के बिना पुरुष अधूरा है ।
पत्नी के बिना पुरुष अधूरा है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

अच्यतम केशवं

अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरम , रामायणम जानकीवल्ल्भम।
नन्द के नन्दनम यशोदा ललनम, पूतना मारनम कंस का वो बधम।
अच्युतम केशवं कृष्ण दामोदरम, राम नारायणम जानकीवल्ल्भम।
कौशल्या सुतम दशरथा नन्दम वन उनका गमन दुष्ट राक्षस बधम।
राम नारायणम जानकीवल्ल्भम।
अच्यतम केशवं कृष्ण दामोदरं राम नारायणम जानकीवल्ल्भम।
अहिल्या तारणम शवरी बेरी खानम, बाली मर्दन करम राज सुग्रीवम दीनम।
राम नारायणम जानकीवल्ल्भम।
अच्यतम केशवं कृष्ण दामोदरं राम नारायणम जानकीवल्ल्भम।
रावण सीता हरणम राम रावण मारणम, लंका विजयम करम राज विभीषण दीनम।
राम नारायणम
जानकीवल्ल्भम।
अच्यतम केशवं कृष्ण दामोदरं राम नारायणम जानकीवल्ल्भम।
अच्यतम केशवं कृष्ण दामोदरं राम नारायणम जानकीवल्ल्भम।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

पति पत्नी की कहानी

पत्नी ने कहा तीन चौथाई जिंदगी आपकी सेवा में गुजार दी ।
अड़तालीस सालों से सेवा करते रहें हैं आपकी ।
पैंसठ साल हमारी उम्र हो गयी है, नाती नातिन भी बड़ी हो गयी हैं ।
क्या कभी शिकवा शिकायत की है आपसे, फिर अब इतने उखड़े उखड़े क्यों रहते हैं ।
मैंने उसे पास बिठाया और प्यार से समझाया, हम उखड़े उखड़े नहीं हैं , उम्र के साथ बड़े हो गये हैं ।
हम भी इतने वर्षों से तुम्हारी चाकरी में ही लगे हैं, माँ बाप भाई बहन से दूर हो गये हैं ।
सुबह निकलते ही आफिस चला जाता हूँ, शाम के पहले ही घर लौट आता हूँ ।
महीने भर की कमाई भी तेरे हाथ ही रखता हूँ , जो सब फरमाइश करती हो लेकर हाजिर होता हूँ ।
बच्चों के लिये दिन रात खटता हूँ , अपने लिये कभी नहीं सोचता हूँ ।
पर सच कहूँ, हमारे माँ बाप ने हमें शादी करके मिलाया है ।
प्यार क्या होता है ये शादी के बाद ही समझ आया है ।
न तुम सेविका हो और न मैं तुम्हारा चाकर हूँ, तुम तो चंदा हो और मैं चकोर हूँ ।
सात जन्मोंके रिश्तों में बंधा हम दोनों दो नहीं एक हैं ।
तुम चंदा मैं चकोर हूँ, तुम चंदा मैं चकोर हूँ ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

माता-पिता

माँ ममतामयी माँ ही बनी रही, पर पिता हमेशा दहशत ही बने रहे ।
माँ बच्चों को अपने आँचल की छाँव दी, पिता दोनों को छाया ही देते रहे।
माँ बच्चों की पसंद का खाना खिलाती रही, पिता उनके लिए सामान ही जुटाते रहे।
बच्चे माँ की गोद में सुख से सोते रहे, पिता उसे कंधों पर ही घुमाते रहे ।
माँ पति की छत्रछाया में निश्चिन्त रही, पिता जमाने का बोझ ही उठाते रहे ।
माँ बच्चों को लोरी सुनाती रही, पिता लोगों की बोली ही सुनते रहे ।
माँ बच्चों की प्यारी माँ बनी रही, पिता एक निष्ठुर निष्ठावान पिता ही रहे ।
पिता हमेशा ही पीते रहे, दुनियाँ का हर गम और बिष ।
वो हलाहल जिससे बचकर बच्चे अमृत पी सके।
माँ ममतामयी माँ बनी रही, पिता एक निष्ठुर कठोर पिता ही रहे ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम