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ठूंठ पेड़

रामजतन राय एक संभ्रांत परिवार के मुखिया थे। उनकी सैकड़ों बीघे पुस्तैनी उपजाऊ जमीन और बाग बगीचे थे। घर में चार चार बैलों की जोड़ी थी, खेती बाड़ी में काम करने वाले दस बीस नौकर चाकर थे। उसकी शादी भी एक जमींदार घराने में हुई थी । सुन्दर पत्नी जो सरल स्वभाव की मृदुभाषी महिला थी। दो साल के अंदर ही घर में पुत्र का जन्म हुआ । इसी खुशी में राय साहब ने अपने घर के सामने खुले मैदान में एक आम का पेड़ लगाया ।
समय के साथ राय साहब का बेटा अजय और उनका लगाया आम का पौधा बढ़ रहा था। पाँच साल के बाद अजय स्कूल जाने लगा और आम का पौधा बढ़कर छोटा मोटा पेड़ बन कर फल देने लगा । घर आँगन में खुशियाँ बढ़ने लगी । राय साहब के घर एक और बेटी तथा बेटा का भी जन्म हो गया । अजय कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर सरकारी अफसर बन गया और उसके छोटे भाई बहन भी पढ़ाई पूरी कर ली। तीनों बेटे बेटियों का व्याह कर राय साहब गंगा नहा लिये । घर बार की सारी जिम्मेदारी छोटे बेटे पर डाल कर वो अब दरवाज़े पर आराम कुर्सी पर बैठे बैठे समाज और आस पास के लोगों की भलाई का काम करते हुए समय बिता रहे थे ।
धीरे-धीरे राय साहब के हाथों से धन दौलत का अधिकार बेटे के हाथों चला गया । राय साहब को क्या चाहिये? समय पर बढ़िया भोजन, सेवा और सम्मान, ये सब उन्हें मिल ही रहा था। उधर उनके लगाये आम का पेड़ अब एक विशाल वृक्ष बन गया था। वर्षों से फलता फूलता पेड़ भी अब बूढ़ा हो गया था । उसपर अब कम फल आने लगा था, साथ ही उसकी कई मोटी मोटी डालियाँ सूखने लगी थी, अतः बच्चों ने उसकी कई डालों को काट काट कर ठूंठ कर दिया था। जो कभी हरी भरी पत्तियों से लदी हुई डालियों पर पंछियों की चहचहाट से गुजायवान थी, वह मात्र एक ठूंठ होकर खड़ी थी। बच्चों को घर के आगे खड़े इस ठूंठ पेड़ से घर की शोभा में रूकावट नजर आने लगी और उन्होंने इस मोटे पेड़ को एक दिन लाखों में बेच दिया ।
राय साहब को इसका बहुत दुःख था, पर उन्हें ये खुशी थी कि बच्चों ने उसे ठूंठ समझकर उनका तिरस्कार नहीं किया है, बरन सम्मान के साथ उनकी सेवा टहल करता आ रहा है । राय साहब बहुत ही खुशकिस्मत हैं कि उन्हें उनकी संतान सदा ही आदरपूर्वक सम्मान दे रहे हैं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

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जवानी का गुरूर

समय सबको समय पर सबकुछ सीखा देता है ।
जवानी में अपने माता-पिता का सम्मान किया है ।
बुढ़ापे में वह सम्मान बच्चे दोगुनी कर लौटा रहा है ।
अपने बुजुर्ग माता-पिता के दिल को दुखाया है ।
उसी का फल आज इस बुढ़ापे में मिल रहा है ।
रोना किस बात पर ,जो बोया वही तो काट रहा है ।
यही तो कर्म फल है, सभी को यहीं भोग जांना है ।
जवानी का गुरूर न कर, ये बुढ़ापा तुम्हें भी आना है

ये बुढ़ापा तुम्हें भी आना है, ये बुढ़ापा तुम्हें भी आना है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

कारगिल दिवस

आज याद आये हैं उन्हें,
सजाये हैं फूल वंदन यहाँ पर ।
कारगिल युद्ध के उन बलिदानियों के लिये,
दीये भी जलाये हैं यहाँ पर ।
उन अमर शहीदों के लिये,
गज़ल भी गुनगुनाये हैं यहाँ पर ।
भूल जायेंगे वो इनको यहाँ से जाने पर ।
शहीदों को याद भले ही करते हैं,
पर जगह भी नहीं देते बैठने को।
सफर करते समय रेल के डिब्बों पर।
फौजियों का दुःख दर्द इन्हें दिखायी नहीं देता है ,
कैन्टीन की सुविधा और पेंशन नज़र आती हैं इन्हें ।
जीवन बीमा भी फौजी अपना खुद ही भरता है ।
और शहीद होने के लिए भी सबसे आगे ही रहता है।
ये सरकार भी अंधी है और कानून भी काला है ।
फौजियों के लिए सब जगह अंधेरा ही अंधेरा है ।
फौजियों के लिए सब जगह अंधेरा ही अंधेरा है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

हम अपने वतन को लौट चलें

आ लौट चलें आ लौट चलें
हम अपने वतन को लौट चलें ।
जिस माटी पर हम जनम लिये,
जिस पर हमने चलना सीखा ।
वह माटी हमें पुकार रही,
आ लौट चलें आ लौट चलें ।
हम अपने वतन को लौट चलें ।
स्कूल कालेज जहाँ पढ़े लिखे,
हम पढ़ लिखकर इनसान बने।
वो स्कूल हमें पुकार रहा,
आ लौट चलें आ लौट चलें ।
हम अपने वतन को लौट चलें ।
यहाँ उँचे पद को पा करके,
हम फर्ज निभाना भूल गये ।
क्यों अपने वतन को भूल गये ।
आ लौट चलें आ लौट चलें ,
हम अपने वतन को लौट चलें ।
गाँव की वो सूनी गलियाँ ,
वो बाग बगीचे के पंछी ।
पक्के कुएँ रेहट वाली ,
पगडंडी तुम्हें पुकार रही ।
आ लौट चलें आ लौट चलें ।
हम अपने वतन को लौट चलें ।
मैया की बनी सौधी रोटी,
वो तोरी अरबी की सब्जी ।
छौकी दाल कढ़ाई की,
वो खीर दही मलाई की।
हम सबको याद वो दिला रही ।
वो बचपन हमें पुकार रही ।
आ लौट चलें आ लौट चलें ।
हम अपने वतन को लौट चलें ।
हम अपने वतन को लौट चलें ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

बुढ़ापा कट जायेगा

पत्नी को साथ में बिठाकर,
दो निवाला उसे खिलाकर तो देखें ।
उनके बनाये भोजन का,
हंसकर तारीफ कर के तो देखें ।
उनके हाथों को पकड़ कर,
कुछ कदम साथ चल कर तो देखें ।
उम्र के इस पड़ाव पर उन्हें,
अपनी बाहों में छुपा कर तो देखें ।
बच्चों की तरह ही कभी,
उन्हें सता कर के तो देखें ।
कभी एकांत में उन्हें ,
प्यार से सहला कर के तो देखें ।
कभी रात में सोते समय ,
उनकी आँखों को चूम कर के तो देखें ।
कभी कभार उनसे दूर रहकर भी तो देखें ।
कभी आँखों में आँखें डाल कर ,
प्यार का इज़हार कर के तो देखें ।
यों ही जवानी की तरह ,
उनका ख्याल रख कर के तो देखें ।
सूखी डाली भी पत्तियों से लद जायेंगी ।
बुढ़ापे में भी जवानी में आ जायेंगी ,
हजार दुखों को भूला कर ,
जिंदगी खुशियों से भर जायेंगी ।
हँसते हँसाते ये बुढ़ापा भी,
यो ही कट जायेंगा ।
हँसते हँसाते ये बुढ़ापा भी,
यो ही कट जायेंगा ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

राम भजन करो भाई


हरि का नाम जपो रे भाई, प्रभु का नाम जपो रे भाई ।
गणिका गिद्ध अजामिल तर गये, तर गयी मीराबाई ।
हरि का नाम जपो रे भाई ।
राम रटत बाल्मीकि जी तर गये, तरी अहिल्याबाई ।
प्रभु का नाम जपो रे भाई ।
राम नाम की लूट मची है, लूट लियो रे भाई ।
हरि का नाम जपो रे भाई ।
सूरदास तुलसी जी तर गये, तरी कौशल्या माई।
हरि का नाम जपो रे भाई ।
प्रभु का नाम जपो रे भाई ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

बेच दिया अपनी माटी को

बेच दिया अपनी माटी को, बेची गोधन गोशाला ।
आकर बस गये शहर में भैया, सोचा जीवन सुखी हमारा ।
बेच दिया फिर हम अपने को, तब बच्चे पढ़ पाये हैं ।
फटी धोती में गुजर गयी है, अपनी भरी जवानी वो।
कहाँ सुहाते हम बच्चों को, जिसने मौज उड़ये हैं ।
कुत्तों के लिये कमरे उनके, माता-पिता पिता पराये हैं ।
भरी जवानी कट गयी खटते, अब यहीं बुढ़ापा कटनी है ।
पुरखों की माटी बेची थी, अब यही पछताना बांकी है । अब यही पछताना बांकी है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

पन्ना धायी

धन्य धन्य पन्ना धायी तू धन्य किया मेवाड़ को।
राजपुत्र पर बार गयी तू अपने ही निज पुत्र को।
आँसू तक न आये तेरे देख के भी बलिदान को ।
बचा लिया मेवाड़ तूने तज अपने निज पुत्र को।
पन्ना धायी हो गयी तज अपने बच्चों निज पुत्र को।
राजधर्म तू निभा गयी है तज अपने निज पुत्र को।
धन्य धन्य पन्ना माई तू धन्य किया मातृत्व को।
युगों युगों तक याद करेगी दुनियाँ तेरी त्याग को ।
युगों युगों तक याद करेगी दुनियाँ तेरी त्याग को ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

आखिरी खत लिखने के पहले


आखिरी खत लिखने के पहले तुम जरूर आना।
इस मन मंदिर की मूरत हो तुम जरूर आना ।
आसरा है आश लगाये बैठी हूँ तुम जरूर आना ।
आना और जरूर आना अपनी मोहिनी छवि दिखला जाना।
बरसों बरस की प्यासी हूँ , इन नयनों की प्यास बुझा जाना।
हे प्रियतम तुम जरूर आना, हे प्रियतम तुम जरूर आना।
आना और जरूर आना, इन प्यासी नयनों की प्यास बुझा जाना।
आखिरी खत लिखने के पहले तुम जरूर आना।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

हम बिक रहे हैं


बिक चुके हैं हम, हर रोज बिक रहे हैं ।
यहाँ जमीं बिक रही है, आसमान बिक रहा है ।
घर बिक रहा है, खलिहान बिक रहा है ।
हम बिक रहे हैं, ईमान बिक रहा है ।
देश बिक रहा है, देश गद्दार बिक रहा है ।
पैसों के लिये बिचौलियों की माँ बहन बिक रही है ।
कुछ लेखक और कवि भी आसानी से बिक रहे हैं ।
इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ हर कोई बिक रहा है ।
और जो नहीं बिक रहे हैं, अपमानित हो रहे हैं ।
और बिकने वाले नोबेल पुरस्कार पा रहे हैं ।
कोयले तो चारों तरफ बिखरे पड़े हैं ।
पर हीरे बहुत ही मुश्किल से मिल रहे हैं ।
कोयले सब जगह जलाये जा रहे हैं ।
और हीरे तिजोरियों में संजोये जा रहे हैं ।
हीरे तिजोरियों में संजोये जा रहे हैं ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम