वह दंभ में रहता है

वह दंभ में रहता है

पुरुष अपनी जवानी में दंभ में रहता है ।
पिता का बना बनाया ये घर उनका है।
धन दौलत उनका है परिवार उनका है।
अपना बचपन भूलकर वह दंभ में रहता है ।
अपने माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
घर के बाहर गराज में उन्हें सुलाता है।
रूखी सूखी रोटियाँ सुबह शाम खिलाता है।
खुद घी मलाई खाता है ऐ सी में रहता है ।
अपने बच्चों को आँखों पर बिठाता है ।
पर माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
आज जो वह माता-पिता के साथ करता है ।
कल उसका बेटा भी यही करने वाला है ।
वह यह भूल जाता है वह दंभ में रहता है ।
इनसान जो बोता है वही वह काटता है ।
माँ बाप में ही भगवान है यही भूल जाता है ।
मंदिरों में घूम घूम कर भगवानों को ढूंढता है।
पत्थरों की मूर्ति में भगवानों को खोजता है ।
माँ बाप में ही भगवान है यही भूल जाता है ।
जीते जागते भगवान को हर पल रूलाता है ।
और पत्थरों के भगवान को दूध पिलाता है।
पर माता-पिता के किये को भूल जाता है ।
अपना बचपन भूलकर वह दंभ में रहता है ।
जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम

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