लड़कियों की आत्मकथा

जन्म लते ही दुत्कारी जाती है, करमजली कहकर बुलायी जाती है ।
रोती बिलखती टूट जाती है, अपनों द्वारा ही सतायी जाती है
भाई बाप के जूठन से पेट भरती है, माँ भी कहाँ बेटी समझती है ।
पढ़ाई लिखाई से दूर रक्खी जाती है, बचपन से ही चूल्हे चौंके में खटती है ।
कमसिन कम उम्र में ही व्याह दी जाती है, छोटी उम्र में ही माँ बन जाती है ।
औरत भी कहाँ किसी औरत के दर्द को समझ पाती है ।
पर औरत ही तो श्रृष्टि चलाती है, उसके त्याग तपस्या ही हमें इनसान बनाती है ।
औरत कभी भी वो सम्मान नहीं पाती है, जिसका वो हकदार होती है ।
छोटी उम्र में हम उसकी, नव दुर्गा रूप में कन्या पूजा करते हैं ।
बड़ी होते ही काम वासना का शिकार बनाते हैं ।
सिर्फ अपनी माँ को ही हम पूजते हैं, बांकी सबको कहाँ मान देते हैं ।
लड़की रूप में जन्म लेना ही अभिशाप है, पर लड़कियों के बिना कहाँ ये संसार है ।
लड़कियों के बिना कहाँ ये संसार है ।

जयहिन्द जयभारत वन्देमातरम ।

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