पेड़ और औरत

पेड़ और औरत दोनों में समानता है।

पेड़ अपने जड़ों से जुड़ा रहता है।

औरत अपने परिवार से जुड़ी रहती है।

पेड़ के मोटे तने पर बहुत सी शाखाएं होती हैं।

सभी शाखाएं तना का अभिन्न अंग रहती है।

औरत भी परिवार रुपी जड़ की तना होती है।

उनके अनेक रूपों में अलग अलग पहचान होती है।

जनमते ही वह बेटी और फिर बहन होती है।

बढ़ती उम्र के साथ रिश्ते भी बदलते रहते हैं।

वह दोस्त – सहेली ,सखी- प्रेमिका, पत्नी बनती है।

शादी होते ही वह दुलहन, भाभी, चाची, मामी बनती है।

माँ बनकर बच्चे पालती , फिर वह दादी नानी बनती है।

पेड़ की तरह वह भी सदा , दूसरों को सुख ही देती रहती है।

पेड़ का काम है छाया देना, फल फूल बाँटते रहना।

बदले में सिर्फ पानी माँगता और संरक्षण माँगता है।

औरत भी तो वही करती है, सबों से प्यार, उनकी सेवा ।

अपने लिए बस सम्मान और सदभाव चाहती है।

जीते जी परिवार के लिए ही खटती और मरती है।

फिर भी हम उसकी दिल से कदर नहीं करते हैं।

पेड़ों की तरह ही उसे, धूप ताप में जलने छोड़ देते हैं।

कब हमारी नींद खुलेगी, औरत के दर्द को समझ पायेंगे।

उसे सही इज्ज़त और सम्मान दे , उनका मान बढ़ा पायेंगे।

उनका हक उन्हें दिला पायेंगे। उनका हक उन्हें दिला पायेंगे।

जयहिंद, जयभारत, वन्देमातरम।

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