आज के बच्चे 

      दत्ता जी मैं आपके विचारों से सहमत हूँ, पेड़ पौधे और इनसान में समानता है, दोनों एक दूसरों के लिए ही जीते आये हैं, जिस तरह पेड़ों से बीज बिखर कर नये पौधों को जनम देते हैं और फिर उन नये पौधों में वही फल फूल लगते हैं, पर स्थान बदलने तथा जलवायु परिवर्तन के कारण उनके फल फूल में बदलाव आ जाता है, कोई अपने मातृ पेड़ से बड़ा या फिर छोटा फल या फूल देता है, या विशेष मिठास वाला या खट्टा स्वाद वाला। पर वह मातृ पेड़ से ही रहता है, यही इनसान के साथ भी होता है, बेटी बेटा अपने माता पिता के गुणों के साथ ही पैदा लेते हैं, पर उसके पालन पोषण तथा सामाजिक परिवेश बदल जाने पर बदलाव हो जाना एक प्राकृतिक गुण है, इसमें चिंता करने या दुखी होने का कोई कारण नहीं है। 

बापे पूत, परापत घोड़ा,नहियों कुछ तो थोड़म थोड़ा। 

न तो पहले सभी बच्चे माँ बाप के 100 % गुण से  परिपूर्ण थे नहीं अब, कम वेस सभी बच्चे माता पिता तथा समाज के प्रति समर्पित हैं। हालांकि उनके सोचने का तरीका अलग अलग है। 

आज समाज और समय बदल रहा है, हमें भी इस बदलाव के साथ मिलकर चलने की कोशिश करनी चाहिए, इसी में परिवार, समाज और हमारी अपनी भलाई है। कुछ भूलें, कुछ नयी चीजों को अपनायें, खुश रहें, खुशियाँ लुटाते रहें, अपनों में, परिवार में, समाज में और प्रिय मित्रों में, 90%जिन्दगी हमने सुख दुख में जीते चले आ रहे हैं, बांकी 10% आनंद से जीयें। बहुत जोड़कर रक्खे हैं, अब धन नहीं जोड़ें,मन को जोड़ें, परमात्मा के साथ, दीन दुखियों के साथ, दोस्तों के साथ, कम खाएं, गम खायें, यदि अंदर से नहीं हँस सकते हैं, तो कम से कम बाहर से हँसते रहें,शायद आपको हँसते देख हम जैसे दूसरे लोग भी हँसना सीख लें। 

सुप्रभात, आज ही नहीं आने वाला हर दिन हमसबों का मंगलमय हो, यही सुरेश की शुभकामना है। 

    जयहिंद जयभारत वन्देमातरम।

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